एनसीआर में तेज गर्मी का कारण सिर्फ बढ़ता पारा ही नहीं बहुत कुछ और भी है
दिल्ली की सर्दी...गाना बहुत फेमस हुआ और सर्दियों में पारे के नीचे गिरने से पिछले कई वर्षों के रिकार्ड टूटे। लेकिन सिर्फ सर्दी ने ही सबको रूलाया ऐसा नहीं है, यहां की गर्मी भी लोगों को पसीने से तर बतर कर तड़पा रही है। राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र में सबसे ज्यादा तरक्की की ओर बढ़ता वह क्षेत्र जहां पर हर कोई अपना आशियाना बनाने की चाह रखता है। लेकिन इस क्षेत्र में लगातार उंचाईयां छू रहे पारे के कारण बढऩे वाली गर्मी ने यहां के लोगों को किसी अन्य जगह या फिर किसी पहाड़ी जगह पर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। क्या सिर्फ बढ़ता हुआ तापमान ही इस बेइंतहा गर्मी का मुख्य कारण है या फिर कुछ और वजह भी है।
दरअसल, प्रकृति ने भी अपने आपको एक निराले और बेहतरीन विज्ञान से निर्मित किया है और समय-समय पर अपने आपको संवारती भी रहती है। जैसे किसी को भी अपने कामों में किसी अन्य का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होता, वैसे ही प्रकृति भी किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करती। यही वजह है कि जितना हम रोज प्रदूषण फैला रहे हैं प्रकृति भी हमको तेज गर्मी, आंधी, तूफान, सूनामी, बिजली, मूसलाधार बारिश, भूकंप सहित न जाने कितनी ही तकलीफें पहुंचा कर अपने संतुलन को बरकरार रखने की कोशिश कर रही है।
आज आधुनिकीकरण की दौड़ में जंगल और पेड़ों को काटकर शहरों का निर्माण हो रहा है जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। एनसीआर में प्रतिदिन दर्जनों इमारतों का निर्माण होना, लाखों वाहनों और हजारों फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं, जहरीली गैसों का अत्याधिक उत्सर्जन सहित न जाने कितने ही तमाम कारण है जो यहां की गर्मी को सिर्र्फ पारे के हिसाब से ही नहीं कई अन्य वजहों से भी बढ़ा रहे हैं।
मौसम विभाग के वैज्ञानिक का कहना है कि काफी हद तक यह सही है कि गर्मी लगने का कारण सिर्फ पारे का चढऩा ही नहीं होता। हमारे आसपास बनी हुईं हजारों फैक्ट्रियां प्रतिदिन वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साईड, सल्फर डाई ऑक्साईड, कार्बन मोनो ऑक्साईड व मीथेन सहित न जाने कितनी ही अन्य हानिकारक और जहरीली गैसें घोलती हैं। इसके साथ ही वाहनों से निकलने वाला धुआं, पुराने हो चुके एअर कंडीशनर व फ्रिज, टायर व पॉलीथीन जैसी गंदगी को जलाना, नॉन रिसाइक्लेबिल प्रोडक्ट्स का प्रयोग, भवन निर्माण में उठने वाली धूल सहित कई ऐसे भी कारण है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे वातावरण को प्रदूषित करने के साथ ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रहे हैं।
वातावरण में गर्मी बढऩे का एक कारण तो ग्लोबल वार्मिंग है ही लेकिन हमारे द्वारा प्रदूषण फैलाने से हमारा लोकल एटमॉशफीयर गर्म होकर ग्लोबल वार्मिंग को और बढ़ाता है। क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ एक ही जगह से नहीं बढ़ती है बल्कि इसके लिए पूरा विश्व जिम्मेदार है।
हमारे क्षेत्र में प्रदूषण बढऩे से गैसों ने एडमॉशफीयर की सबसे निचली सतह लोअर ट्रोपोस्फीयर के पास तक गैसों की एक लेयर(पर्त) बना दी है। जिससे हमारे आस पास का तापमान बढऩे से हमारे आस पास की हवा गर्म हो जाती है और इन प्रदूषित गैसों की पर्त के कारण ज्यादा उपर नहीं उठ पाती। चूंकि यहां पर पेड़ों की संख्या पर्याप्त न होकर कम है इसलिए यह गर्म हवा चारों ओर चलती रहती है। जिसके फलस्वरूप हमकड्ड भारत के ज्यादातर क्षेत्रों की तुलना में यहां पर गर्मी कुछ ज्यादा ही महसूस होती है।
गर्मी लगने के मुख्य कारण-
-फोटो सेंथेसिज(प्रकाश संश्लेषण क्रिया)- सूरज की रोशनी और वातावरण की कार्बन डाई ऑक्साईड गैस को पेड़ों की पत्तियां शोषित कर लेती हैं और वातावरण में ऑक्सीजन गैस उत्सर्जित करती हैं। पेड़ों की कमी से वातावरण में जहरीली गैसों की बढ़ोत्तरी, ऑक्सीजन की कमी, ठंडी हवा की कमी और भूगर्भ जल स्तर की गिरावट होती है। जिसके फलस्वरूप हम गर्म हवा, लू, ज्यादा तापमान, उमस की शिकायत करते हैं।
-ह्यïूमिडिटी- हवा में वाष्प की मात्रा को कहते हैं। हाई ह्यïूमिडिटी में पसीना निकलने में परेशानी होती है और ज्यादा गर्मी लगती है।
-कंफर्ट इंडेक्स- ह्यïूमिडिटी और तापमान के संयुक्त प्रभाव को कहते हैं। दोनों के बढऩे से कंफर्ट इंडेक्स बढ़ता है और गर्मी ज्यादा परेशान करती है।
Sunday, 11 April 2010
Tuesday, 6 April 2010
Worlh Health Day: Unsafe Syringes & Increasing Patients
असुरक्षित इंजेक्शन का प्रयोग दे रहा अनचाही बीमारियों को न्यौता
तेजी से बढ़ते जा रही तकनीकी और विज्ञान के नवीन अनुप्रयोगों के बावजूद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। प्रतिवर्ष सात अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष रूप से यह जानकारी आपको जरूर चौंकाएगी। रिपोर्ट के अनुसार विश्व के विकासशील देशों में प्रयोग किए जाने वाले आधे से ज्यादा इंजेक्शन असुरक्षित होते हैं। जिनसे बीमार को फायदा कम और अनचाही बीमारियां ज्यादा मिलती हैं। बढ़ती कालाबाजारी और अप्रशिक्षित कर्मचारियों के कारण हमारे देश के सरकारी अस्पतालों में भी लगभग सत्तर फीसदी इंजेक्शन असुरक्षित हैं।
वल्र्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन (डब्लूएचओ) की मानें तो विकासशील देशों में कई खतरनाक और अनचाही बीमारियां मुफ्त मेंं मिल रही हैं। हालांकि अनचाही बीमारियां पाने वालों में सबसे ज्यादा संख्या गरीब और किसानों की हैं जो धनाभाव के कारण झोलाछाप और छोटे-मोटे चिकित्सकों से अपना इलाज कराते हैं। गरीबों से पैसे ऐंठने के फेर में यह चिकित्सक इनको हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, एड्स जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार बना रहे हैं।
हिंदुस्तान सहित कई विकासशील देशों में असुरक्षित सिरिंज का इस्तेमाल मौत को दावत दे रहा है। थोड़े सा पैसे कमाने के फेर में झोलाछाप डाक्टर्स और नीम-हकीम एक सिरिंज को कई बार इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा पिछड़े इलाकों में तमाम कंपनियां भी एक बार प्रयोग हो चुके इंजेक्शन को दोबारा नई पैकिंग में बेच देती हैं। कुशल कंपाउडर्स और अटेंडेंट की कमी भी इंजेक्शन को संक्रमित कर देती है। देश में आज भी काफी अस्पतालों में कांच के इंजेक्शन जो अच्छी तरह से स्ट्रलाइज नहीं होते प्रयोग किए जाते हैं। इन सभी का इस्तेमाल सिर्फ बीमारियों को न्यौता ही दे रहा है।
क्या कहती है शोध रिपोर्ट
सरकारी अस्पतालों को दिए जाने वाले लगभग 35 प्रतिशत इंजेक्शन पूरी तरह से स्ट्रलाइज नहीं होते जबकि लगभग 34 फीसदी खराब रखरखाव और अप्रशिक्षित कर्मियों के द्वारा प्रयोग किए जाने से संक्रमित हो जाते हैं। देश में करीब 75 फीसदी सिरिंज प्लास्टिक के होते हैं जबकि अन्य कांच के। निजी अस्पतालों में भी करीब 59 फीसदी इंजेक्शन संक्रमण फैलाते हैं।
संक्रमित इंजेक्शन से भारत की बीमारियों का ब्यौरा
-53.6 प्रतिशत हेपेटाइटिस बी
-59.5 फीसदी हेपेटाइटिस सी
-24.3 फीसदी एचआईवी एड्स
-5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 71 फीसदी इंजेक्शन दिए जाते हैं जबकि 25 से 59 वर्ष के लोगों को 70 फीसदी।
-48.1 प्रतिशत हर प्रेसक्रिप्शन में इंजेक्शन की सिफारिश की जाती है।
क्यों होता है संक्रमण
-सही ढंग से स्ट्रलाइज न होना
-सुई को दोबारा इस्तेमाल करना
-इंजेक्शन की री-पैकिंग
-बायो-वेस्ट मैनेजमेंट की कमी
-कांच के इंजेक्शनों का इस्तेमाल
-अप्रशिक्षित कर्मियों द्वारा प्रयोग करना
-नियमित ड्रग्स और इंसुलिन लेने वाले
-झोलाछाप डाक्टर्स द्वारा
आटो डिसेबल सिरिंज है निवारण
देश भर में हर साल लाखों लोगों में संक्रमण फैला रहा इंजेक्शन को देखने से सही या खराब का फैसला नहीं किया जा सकता। कई कंपनियों द्वारा बाजार में लाया गया आटो डिसेबल सिरिंज (एडीएस) काफी कारगर साबित हुआ है। एडीएस इंजेक्शन में ऐसी प्रणाली इस्तेमाल होती है जिससे इसके प्रयोग के बाद यह स्वत: ही लाक होकर बेकार हो जाता है और दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता।
सावधानी भी है बचाव
-हमेशा प्रतिष्ठित मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन खरीदें
-बिल से जरूर लें
-जांच ले कि इंजेक्शन की पैकिंग सही है
-कांच का इंजेक्शन लगवाने से मना कर दें
-डिस्पोजेबल सिरिंज को इस्तेमाल के बाद नष्ट कर दें
-अस्पतालों में बायो-वेस्ट मैनेजमेंट का सही प्रयोग हो
-झोलाछाप डाक्टर्स और नीम-हकीम से इलाज न कराएं
तेजी से बढ़ते जा रही तकनीकी और विज्ञान के नवीन अनुप्रयोगों के बावजूद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। प्रतिवर्ष सात अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष रूप से यह जानकारी आपको जरूर चौंकाएगी। रिपोर्ट के अनुसार विश्व के विकासशील देशों में प्रयोग किए जाने वाले आधे से ज्यादा इंजेक्शन असुरक्षित होते हैं। जिनसे बीमार को फायदा कम और अनचाही बीमारियां ज्यादा मिलती हैं। बढ़ती कालाबाजारी और अप्रशिक्षित कर्मचारियों के कारण हमारे देश के सरकारी अस्पतालों में भी लगभग सत्तर फीसदी इंजेक्शन असुरक्षित हैं।
वल्र्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन (डब्लूएचओ) की मानें तो विकासशील देशों में कई खतरनाक और अनचाही बीमारियां मुफ्त मेंं मिल रही हैं। हालांकि अनचाही बीमारियां पाने वालों में सबसे ज्यादा संख्या गरीब और किसानों की हैं जो धनाभाव के कारण झोलाछाप और छोटे-मोटे चिकित्सकों से अपना इलाज कराते हैं। गरीबों से पैसे ऐंठने के फेर में यह चिकित्सक इनको हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, एड्स जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार बना रहे हैं।
हिंदुस्तान सहित कई विकासशील देशों में असुरक्षित सिरिंज का इस्तेमाल मौत को दावत दे रहा है। थोड़े सा पैसे कमाने के फेर में झोलाछाप डाक्टर्स और नीम-हकीम एक सिरिंज को कई बार इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा पिछड़े इलाकों में तमाम कंपनियां भी एक बार प्रयोग हो चुके इंजेक्शन को दोबारा नई पैकिंग में बेच देती हैं। कुशल कंपाउडर्स और अटेंडेंट की कमी भी इंजेक्शन को संक्रमित कर देती है। देश में आज भी काफी अस्पतालों में कांच के इंजेक्शन जो अच्छी तरह से स्ट्रलाइज नहीं होते प्रयोग किए जाते हैं। इन सभी का इस्तेमाल सिर्फ बीमारियों को न्यौता ही दे रहा है।
क्या कहती है शोध रिपोर्ट
सरकारी अस्पतालों को दिए जाने वाले लगभग 35 प्रतिशत इंजेक्शन पूरी तरह से स्ट्रलाइज नहीं होते जबकि लगभग 34 फीसदी खराब रखरखाव और अप्रशिक्षित कर्मियों के द्वारा प्रयोग किए जाने से संक्रमित हो जाते हैं। देश में करीब 75 फीसदी सिरिंज प्लास्टिक के होते हैं जबकि अन्य कांच के। निजी अस्पतालों में भी करीब 59 फीसदी इंजेक्शन संक्रमण फैलाते हैं।
संक्रमित इंजेक्शन से भारत की बीमारियों का ब्यौरा
-53.6 प्रतिशत हेपेटाइटिस बी
-59.5 फीसदी हेपेटाइटिस सी
-24.3 फीसदी एचआईवी एड्स
-5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 71 फीसदी इंजेक्शन दिए जाते हैं जबकि 25 से 59 वर्ष के लोगों को 70 फीसदी।
-48.1 प्रतिशत हर प्रेसक्रिप्शन में इंजेक्शन की सिफारिश की जाती है।
क्यों होता है संक्रमण
-सही ढंग से स्ट्रलाइज न होना
-सुई को दोबारा इस्तेमाल करना
-इंजेक्शन की री-पैकिंग
-बायो-वेस्ट मैनेजमेंट की कमी
-कांच के इंजेक्शनों का इस्तेमाल
-अप्रशिक्षित कर्मियों द्वारा प्रयोग करना
-नियमित ड्रग्स और इंसुलिन लेने वाले
-झोलाछाप डाक्टर्स द्वारा
आटो डिसेबल सिरिंज है निवारण
देश भर में हर साल लाखों लोगों में संक्रमण फैला रहा इंजेक्शन को देखने से सही या खराब का फैसला नहीं किया जा सकता। कई कंपनियों द्वारा बाजार में लाया गया आटो डिसेबल सिरिंज (एडीएस) काफी कारगर साबित हुआ है। एडीएस इंजेक्शन में ऐसी प्रणाली इस्तेमाल होती है जिससे इसके प्रयोग के बाद यह स्वत: ही लाक होकर बेकार हो जाता है और दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता।
सावधानी भी है बचाव
-हमेशा प्रतिष्ठित मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन खरीदें
-बिल से जरूर लें
-जांच ले कि इंजेक्शन की पैकिंग सही है
-कांच का इंजेक्शन लगवाने से मना कर दें
-डिस्पोजेबल सिरिंज को इस्तेमाल के बाद नष्ट कर दें
-अस्पतालों में बायो-वेस्ट मैनेजमेंट का सही प्रयोग हो
-झोलाछाप डाक्टर्स और नीम-हकीम से इलाज न कराएं
Thursday, 1 April 2010
Beware, someone is making u fool
आज रहिए कूल, ताकि कोई बना न दे अप्रैल फूल
एक तारीख मतलब अप्रैल फूल किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। खासकर उन व्यक्तियों के लिए जो दीन-दुनिया से बेखबर अपने में ही खोए रहते हैं। आज कूल बने रहना आपको कई मुसीबतों से बचा सकता है। किसी दोस्त के एसएमएस, पड़ोसी की गुगली, गर्लफ्रैंड की फोनकाल या फिर किसी सहकर्मी की ई-मेल देखने के बाद हर तरीके से सोच समझ कर ही कोई कार्य करना आपको हंसी का पात्र बनाने से बचा सकता है।
हर साल की तरह आज एक अप्रैल यानी कि अप्रैल फूल डे है। यह वही दिन है जिस दिन दुनिया भर के हर कोने में लाखों-करोड़ों लोग मजाक बन कर रह जाते हैं। समय के साथ हाईटेक होते लोग भी अप्रैल फूल बनाने के लिए एक से बढ़कर एक तरीके एख्तियार कर रहे हैं। अब दोस्तों को पुराने तरीकों से बेवकूफ बनाना आसान नहीं रहा। इसके लिए इंटरनेट काफी मददगार साबित हो रहा है।
अप्रैल फूल बनाने के लिए इंटरनेट पर हजारों वेबसाइट मौजूद हैं। जिनमें एक से एक मजेदार और फुलप्रूफ तरीके बताए गए हैं। कुछ तरीके तो इतने मजेदार हैं जिनको कोई बिना मूर्ख बने समझ ही नहीं सकता है। जैसे काफी मग में व्हाइट पेपर (सफेद मिर्च) लगाकर काफी सर्व करना किसी के पकड़ में नहीं आने वाला।
एक से बढ़कर एक जबर्दस्त एसएमएस और ग्रीटिंग्स की भरमार है। बहाने भी इतने सालिड हैं कि वाकई अब दोस्तों की खैर नहीं।
बाक्स
क्या करें ताकि न बन पाएं अप्रैल फूल
-कोई भी एसएमएस, फोनकाल या ई-मेल का न तो तुरंत रिप्लाई और न हीं कोई निर्णय लें
-अपने दोस्तों से विशेषरूप से सावधानी बरतें
-अचानक बने पार्टी वगैरह के कार्यक्रम में शिरकत करने से बचें
-कहीं भी जाने पर सोच-विचार कर ही कोई कार्य करें
-सिर्फ करीबी ही नहीं अनजान लोग भी आपको बेवकूफ बनाने में खुश होते हैं
बेवकूफ बनाने से पहले सोचें जरूर
-ध्यान रखें कि मजाक केवल एक हद में ही होता है
-अप्रैल फूल बनाने के चक्कर में किसी की भावनाओं, जाति-धर्म, मासूमियत या विश्वास का फायदा न उठाएं
-अनजान को मूर्ख बनाने से पहले प्रतिक्रिया के बारे में सोच लें
-शारीरिक या फिर सामाजिक स्तर पर मखौल उड़ाने से बचें
-सोचें कि यदि आप उस जगह होते तो क्या करते
यदि बन ही जाएं तो क्या करें
-संयमित होकर अपने को समझाएं कि यह केवल एक मजाक है
-गुस्सा या झगड़ा न करें
-गंभीर स्थिति में फंस गए हों तो बड़ी ही सूझबूझ से अपने आप को बाहर निकालें
-किसी पब्लिक प्लेस पर मजाक बनने पर मुस्कराते हुए धन्यवाद देना आपकी महानता व्यक्त करेगा
-केवल एक प्यार भरी हंसी सामने वाले का भी मजाक बना सकती है
पिछले कुछ सालों के प्रसिद्ध किस्से
अप्रैल फूल अब बहुत बड़े स्तर पर बेवकूफ बना रहा है। इसके लिए तमाम लोग मीडिया और हाइटेक संचार यंत्रों का भी सहारा लेने से नहीं चूकते। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के तमाम ऐसे किस्से जिन्होंने हजारों लाखों लोगों को बेवकूफ बनाया।
-ब्रिटनी स्पियर्स और संजय का विवाह
-बिल गेट्स का इस्लाम धर्म कबूलना
-बीएमडब्लू कार, स्पेस सैटेलाइट, जीपीएस सिस्टम आदि से संबंधित कई खबरें
-मंगल ग्रह पर पानी की खबर
-विंडोज कंप्यूटर सिस्टम पर है विंडोज वायरस की ई-मेल
एक तारीख मतलब अप्रैल फूल किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। खासकर उन व्यक्तियों के लिए जो दीन-दुनिया से बेखबर अपने में ही खोए रहते हैं। आज कूल बने रहना आपको कई मुसीबतों से बचा सकता है। किसी दोस्त के एसएमएस, पड़ोसी की गुगली, गर्लफ्रैंड की फोनकाल या फिर किसी सहकर्मी की ई-मेल देखने के बाद हर तरीके से सोच समझ कर ही कोई कार्य करना आपको हंसी का पात्र बनाने से बचा सकता है।
हर साल की तरह आज एक अप्रैल यानी कि अप्रैल फूल डे है। यह वही दिन है जिस दिन दुनिया भर के हर कोने में लाखों-करोड़ों लोग मजाक बन कर रह जाते हैं। समय के साथ हाईटेक होते लोग भी अप्रैल फूल बनाने के लिए एक से बढ़कर एक तरीके एख्तियार कर रहे हैं। अब दोस्तों को पुराने तरीकों से बेवकूफ बनाना आसान नहीं रहा। इसके लिए इंटरनेट काफी मददगार साबित हो रहा है।
अप्रैल फूल बनाने के लिए इंटरनेट पर हजारों वेबसाइट मौजूद हैं। जिनमें एक से एक मजेदार और फुलप्रूफ तरीके बताए गए हैं। कुछ तरीके तो इतने मजेदार हैं जिनको कोई बिना मूर्ख बने समझ ही नहीं सकता है। जैसे काफी मग में व्हाइट पेपर (सफेद मिर्च) लगाकर काफी सर्व करना किसी के पकड़ में नहीं आने वाला।
एक से बढ़कर एक जबर्दस्त एसएमएस और ग्रीटिंग्स की भरमार है। बहाने भी इतने सालिड हैं कि वाकई अब दोस्तों की खैर नहीं।
बाक्स
क्या करें ताकि न बन पाएं अप्रैल फूल
-कोई भी एसएमएस, फोनकाल या ई-मेल का न तो तुरंत रिप्लाई और न हीं कोई निर्णय लें
-अपने दोस्तों से विशेषरूप से सावधानी बरतें
-अचानक बने पार्टी वगैरह के कार्यक्रम में शिरकत करने से बचें
-कहीं भी जाने पर सोच-विचार कर ही कोई कार्य करें
-सिर्फ करीबी ही नहीं अनजान लोग भी आपको बेवकूफ बनाने में खुश होते हैं
बेवकूफ बनाने से पहले सोचें जरूर
-ध्यान रखें कि मजाक केवल एक हद में ही होता है
-अप्रैल फूल बनाने के चक्कर में किसी की भावनाओं, जाति-धर्म, मासूमियत या विश्वास का फायदा न उठाएं
-अनजान को मूर्ख बनाने से पहले प्रतिक्रिया के बारे में सोच लें
-शारीरिक या फिर सामाजिक स्तर पर मखौल उड़ाने से बचें
-सोचें कि यदि आप उस जगह होते तो क्या करते
यदि बन ही जाएं तो क्या करें
-संयमित होकर अपने को समझाएं कि यह केवल एक मजाक है
-गुस्सा या झगड़ा न करें
-गंभीर स्थिति में फंस गए हों तो बड़ी ही सूझबूझ से अपने आप को बाहर निकालें
-किसी पब्लिक प्लेस पर मजाक बनने पर मुस्कराते हुए धन्यवाद देना आपकी महानता व्यक्त करेगा
-केवल एक प्यार भरी हंसी सामने वाले का भी मजाक बना सकती है
पिछले कुछ सालों के प्रसिद्ध किस्से
अप्रैल फूल अब बहुत बड़े स्तर पर बेवकूफ बना रहा है। इसके लिए तमाम लोग मीडिया और हाइटेक संचार यंत्रों का भी सहारा लेने से नहीं चूकते। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के तमाम ऐसे किस्से जिन्होंने हजारों लाखों लोगों को बेवकूफ बनाया।
-ब्रिटनी स्पियर्स और संजय का विवाह
-बिल गेट्स का इस्लाम धर्म कबूलना
-बीएमडब्लू कार, स्पेस सैटेलाइट, जीपीएस सिस्टम आदि से संबंधित कई खबरें
-मंगल ग्रह पर पानी की खबर
-विंडोज कंप्यूटर सिस्टम पर है विंडोज वायरस की ई-मेल
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Sunday, 21 March 2010
Dr. Kumar Vishwas Latest & Exclusive Video 1 @ Grater Noid a
Dr. Kumar Vishwas Latest & Exclusive Video 1 @ Grater Noida
on 12 march 2010
In this video he first time added some lines in his famous poetry.....Koi deewana kahta hai koi pagal samajhta hai........
These are as
Karoon kuch bhi magar duniya ko sab achcha hi lagta hai,
mujhe tum bin magar duniya me kuch achcha nahi lagta.
on 12 march 2010
In this video he first time added some lines in his famous poetry.....Koi deewana kahta hai koi pagal samajhta hai........
These are as
Karoon kuch bhi magar duniya ko sab achcha hi lagta hai,
mujhe tum bin magar duniya me kuch achcha nahi lagta.
Tuesday, 16 March 2010
Exclusive Interview Of Dr. Kumar Vishwas
'करूं कुछ भी मैं अब दुनिया को सब अच्छा ही लगता है,
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता।Ó
युवाओं में लोकप्रिय एक इडियट रैंचो हंै डॉ. कुमार विश्वास
*एक निरपेक्ष और निडर कम्यूनिकेटर बनना चाहता हूं*
*मैं तो युवाओं की भावनाओं के संवाद का जरिया मात्र हूं*
भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के भी लाखों युवाओं ने सैकड़ों बार उन्हें सुना, पढ़ा, डाउनलोड और फॉरवर्ड किया है। लाखों युवाओं के लिए वो एक जीता जागता संदेश हैं। अंर्तआत्मा की आवाज सुनकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी और पीसीएस की नौकरी को लात मार दी। देश के विकास में युवाओं को एकजुट करने वाले, इंजीनियरिंग-मेडिकल-मैनेजमेंट छात्रों के अलावा नौकरीपेशा युवाओं के बीच बहुचर्चित और मोती जैसे शब्दों को अपनी दिलकश आवाज में पिरोकर कभी हंसाने तो कभी रुलाने वाली अंतरराष्ट्रीय शख्सियत का नाम है डॉ. कुमार विश्वास।
जी हां, कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है और पगली लड़की जैसी कविताओं के जरिए युवाओं के दिल में राज करने वाले डॉ. कुमार आज के युवाओं के बीच थ्री इडियट्स के एक इडियट यानी रैंचो बन चुके हैं। पेश है अपनी आवाज और शब्दों के जादू से युवाओं को झकझोर देने वाले डॉ. कुमार से पहली बार हुई किसी खास बातचीत के महत्वपूर्ण अंश।
प्रश्न: आपको क्या कहें वर्चुअल कवि, मोटीवेटर या फिर कुछ और?
डॉ. कुमार-मैं पारंपरिक कवियों की श्रेणी का नहीं बल्कि नई जमात का कम्यूनिकेटर मात्र हूं। उस जमात का जो बेहतर कम्यूनिकेशन के अभाव में एनरिके इग्लेसियस के सम बॉडी को सुन रही थी, फ्रैंड्स देख रही थी। इनको एक ऐसा शख्स चाहिए था जो इनके दिल की बात कहे, इसलिए नियति ने मुझे चुन लिया।
प्रश्न: पढ़ाई और ह्रदय परिवर्तन की क्या कहानी है?
डॉ. कुमार-ये बहुत लोकप्रिय और बदनाम कहानी हो चुकी है। मैं निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से हूं जहां पर रोटी के लिए संघर्ष करना जरूरी होता है। मेरे दौर में आज की तरह पढ़ाई के विकल्प नहीं थे। पिता जी ने मानसिक, आर्थिक, आध्यात्मिक और शारीरिक शक्तियां प्रयोग कीं। राष्ट्रीय स्तर पर 99वीं रैंक से एमएलएनआर इलाहाबाद में इंजीनियरिंग के लिए चयनित हुआ। पहले सेमेस्टर के बाद रजनीश की किताब माटी कहे कुम्हार से पढ़ कर लगा कि नियति के विपरीत नहीं जाना चाहिए। मेरा ह्रदय तो हिंदी में रचता-बसता है तो फिर यह उल्टी धारा क्यूं। फिर मैने स्नातक किया। परास्नातक प्रथम वर्ष में यूपीपीसीएस में चयनित हुआ, मुरादाबाद की एक जगह पर साढ़े तीन माह सहायक जिला परियोजना अधिकारी रहा। लेकिन फिर लगा कि क्यों प्रदेश और देश को बर्बाद किया जाए (हंसते हुए)। लेकिन नौकरी करने का जो कारण था वो चला (चली) गया, जबकि नौकरी पा चुका था। परास्नातक में विश्वविद्यालय टॉप किया। लेकिन नियति को यहीं मंजूर था। परास्नातक पूर्ण किया और उसी वर्ष यूजीसी में चयनित हो गया। तबसे कॉलेज में पढ़ा रहा हूं लेकिन गत चार वर्षों से बिना वेतन हूं लेकिन अब नहीं लगता कि नौकरी कर पाऊंगा।
प्रश्न: अखबार-टीवी से अलग इंटरनेट पर इतनी प्रसिद्धि के पीछे आपकी साजिश तो नहीं?
डॉ. कुमार-देखिए मैं मीडिया फ्रैंडली नहीं हूं। हालांकि मीडिया जगत के तमाम बड़े दिग्गज मेरे पुराने मित्रों में से हैं। इसी कारण के चलते मैं देश के एक काफी बड़े टीवी चैनल के बुलावे पर भी नहीं गया। लॉफ्टर शो में नहीं गया और आज भी बिग बॉस थ्री के लिए मुझे ट्रेस किया जा रहा है। लेकिन मैंने मना कर दिया। क्योंकि मैं जानता हूं कि वो मेरे कम्यूनिकेशन स्किल्स और लफ्फाजी से कमाना चाहते हैं। इसलिए एक ऐसा निरपेक्ष कम्यूनिकेटर बनने का मन है जो न किसी से डरता हो और न किसी की चिंता करता हो। कुछ सोचा समझा यह कार्य नहीं है बल्कि मेरे प्रशंसकों और चाहने वालों द्वारा इंटरनेट और यूट्यूब के जरिए फैलाया गया है। विश्व भर के लाखों युवा नियमित तौर पर मुझे ऑनलाइन तलाश किया करते हैं।
प्रश्न: इतने तल्ख विचार, क्रांतिकारी वक्तव्य और प्रेम, देशप्रेम, सौहार्द में डूबी कविताओं के जरिए आखिर आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहते हैं?
डॉ. कुमार-देखिए मैं जिनसे बात कर रहा हूं उनसे कोई बात नहीं करता। कक्षा नौ में पहुंचते ही उन्हें ट्रिग्नोमेट्री पकड़ा दी जाती है। फिर उन्हें भेज दिया जाता है कोटा जहां पर इंजीनियरिंग की तैयारी के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला लिया जहां प्रोफेसर्स की टेढ़ी नजर हमेशा उनपर बनीं रहती है। वे बच्चे न तो पूरी तरह से अपने मन का कर पाते हैं और न ही अपने शिक्षकों, अभिभावकों की चाहत पर खरा उतर पाते हैं। लेकिन उससे कोई कम्यूनिकेट ही नहीं कर रहा है। देश का वो सबसे सशक्त तबका घुटा जा रहा है। क्या हमारे लिए यह एक बड़ी ही सोच का विषय नहीं है कि एक क्लर्क ने अपनी मेहनत और फंड की जोड़ी गई कमाई से पढ़ाकर अपने बच्चे को इंजीनियर बनाया। बच्चे ने कानपुर आईआईटी से एमटेक किया और चार माह तक उसे प्लेसमेंट नहीं मिला तो उसने आत्महत्या कर ली। इसलिए न तो मेरी रामदेव बनने की इच्छा है और न ही किसी राजनीतिक दल से जुडऩे की इच्छा है (जिनके तमाम प्रस्ताव मेरे पास हैं)। न तो मुझे स्वर शक्ति का दुरुपयोग करने की इच्छा है। मैं तो एक ऐसा कम्यूनिकेटर बनना चाहता हूं जो दो पाइप के बीच वाल्व का काम करे। जिससे युवाओं की ऊर्जा को देश के लिए, उनके घरों के लिए और मानवता के लिए इस्तेमाल कर सकूं। अगर मैं युवाओं के पास जाकर उनसे कहता है कि यह करो यह मत करो तो वे कतई नहीं मानते। इसलिए अपने जीवन की घटनाओं और परिस्थितियों के अलावा आसपास की घटनाओं पर गौर किया और उन्हें सुनाने लगा। संयोगवश मेरी रचनाएं युवाओं ने इतनी पसंद कीं कि उन्हें इंटरनेट, यूट्यूब, आईपॉड के जरिए दुनियाभर में पसंद किया जाने लगा। आज युवा जमकर मुझे सुन रहे हैं और तमाम मेरी बात भी मान रहे हैं।
प्रश्न: नाम बताना चाहेंगे उस कारण का।
डॉ. कुमार-तुम्हारे आंखों की तौहीन है जरा सोचो, तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है।। अब क्या जरूरत रह गई नाम बताने की।
प्रश्न: कुछ पंक्तियां हमारे युवाओं के लिए सुनाएंगे?
डॉ. कुमार-चलिए सबसे पहले आप को वो पंक्ति सुनाता हूं जो आज से पहले किसी भी महफिल में नहीं सुनाई। यूट्यूब या कहीं पर भी यह पंक्तियां नहीं मिलेंगी। बिल्कुल ताजी हैं।
'कोई कब तक महज सोचे कोई कब तक महज गाए,
इलाही क्या ये मुमकिन है कि कुछ ऐसा भी हो जाए।
मेरा मेहताब उसकी रात के आगोश में पिघले,
मैं उसकी नींद में जागूं वो मुझमें घुल के सो जाए।
कोई मंजिल नहीं जचती सफर अच्छा नहीं लगता,
अगर घर लौट भी आऊं तो घर अच्छा नहीं लगता।
करूं कुछ भी मैं अब दुनिया को सब अच्छा ही लगता है,
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता।।Ó
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता।Ó
युवाओं में लोकप्रिय एक इडियट रैंचो हंै डॉ. कुमार विश्वास
*एक निरपेक्ष और निडर कम्यूनिकेटर बनना चाहता हूं*
*मैं तो युवाओं की भावनाओं के संवाद का जरिया मात्र हूं*
भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के भी लाखों युवाओं ने सैकड़ों बार उन्हें सुना, पढ़ा, डाउनलोड और फॉरवर्ड किया है। लाखों युवाओं के लिए वो एक जीता जागता संदेश हैं। अंर्तआत्मा की आवाज सुनकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी और पीसीएस की नौकरी को लात मार दी। देश के विकास में युवाओं को एकजुट करने वाले, इंजीनियरिंग-मेडिकल-मैनेजमेंट छात्रों के अलावा नौकरीपेशा युवाओं के बीच बहुचर्चित और मोती जैसे शब्दों को अपनी दिलकश आवाज में पिरोकर कभी हंसाने तो कभी रुलाने वाली अंतरराष्ट्रीय शख्सियत का नाम है डॉ. कुमार विश्वास।
जी हां, कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है और पगली लड़की जैसी कविताओं के जरिए युवाओं के दिल में राज करने वाले डॉ. कुमार आज के युवाओं के बीच थ्री इडियट्स के एक इडियट यानी रैंचो बन चुके हैं। पेश है अपनी आवाज और शब्दों के जादू से युवाओं को झकझोर देने वाले डॉ. कुमार से पहली बार हुई किसी खास बातचीत के महत्वपूर्ण अंश।
प्रश्न: आपको क्या कहें वर्चुअल कवि, मोटीवेटर या फिर कुछ और?
डॉ. कुमार-मैं पारंपरिक कवियों की श्रेणी का नहीं बल्कि नई जमात का कम्यूनिकेटर मात्र हूं। उस जमात का जो बेहतर कम्यूनिकेशन के अभाव में एनरिके इग्लेसियस के सम बॉडी को सुन रही थी, फ्रैंड्स देख रही थी। इनको एक ऐसा शख्स चाहिए था जो इनके दिल की बात कहे, इसलिए नियति ने मुझे चुन लिया।
प्रश्न: पढ़ाई और ह्रदय परिवर्तन की क्या कहानी है?
डॉ. कुमार-ये बहुत लोकप्रिय और बदनाम कहानी हो चुकी है। मैं निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से हूं जहां पर रोटी के लिए संघर्ष करना जरूरी होता है। मेरे दौर में आज की तरह पढ़ाई के विकल्प नहीं थे। पिता जी ने मानसिक, आर्थिक, आध्यात्मिक और शारीरिक शक्तियां प्रयोग कीं। राष्ट्रीय स्तर पर 99वीं रैंक से एमएलएनआर इलाहाबाद में इंजीनियरिंग के लिए चयनित हुआ। पहले सेमेस्टर के बाद रजनीश की किताब माटी कहे कुम्हार से पढ़ कर लगा कि नियति के विपरीत नहीं जाना चाहिए। मेरा ह्रदय तो हिंदी में रचता-बसता है तो फिर यह उल्टी धारा क्यूं। फिर मैने स्नातक किया। परास्नातक प्रथम वर्ष में यूपीपीसीएस में चयनित हुआ, मुरादाबाद की एक जगह पर साढ़े तीन माह सहायक जिला परियोजना अधिकारी रहा। लेकिन फिर लगा कि क्यों प्रदेश और देश को बर्बाद किया जाए (हंसते हुए)। लेकिन नौकरी करने का जो कारण था वो चला (चली) गया, जबकि नौकरी पा चुका था। परास्नातक में विश्वविद्यालय टॉप किया। लेकिन नियति को यहीं मंजूर था। परास्नातक पूर्ण किया और उसी वर्ष यूजीसी में चयनित हो गया। तबसे कॉलेज में पढ़ा रहा हूं लेकिन गत चार वर्षों से बिना वेतन हूं लेकिन अब नहीं लगता कि नौकरी कर पाऊंगा।
प्रश्न: अखबार-टीवी से अलग इंटरनेट पर इतनी प्रसिद्धि के पीछे आपकी साजिश तो नहीं?
डॉ. कुमार-देखिए मैं मीडिया फ्रैंडली नहीं हूं। हालांकि मीडिया जगत के तमाम बड़े दिग्गज मेरे पुराने मित्रों में से हैं। इसी कारण के चलते मैं देश के एक काफी बड़े टीवी चैनल के बुलावे पर भी नहीं गया। लॉफ्टर शो में नहीं गया और आज भी बिग बॉस थ्री के लिए मुझे ट्रेस किया जा रहा है। लेकिन मैंने मना कर दिया। क्योंकि मैं जानता हूं कि वो मेरे कम्यूनिकेशन स्किल्स और लफ्फाजी से कमाना चाहते हैं। इसलिए एक ऐसा निरपेक्ष कम्यूनिकेटर बनने का मन है जो न किसी से डरता हो और न किसी की चिंता करता हो। कुछ सोचा समझा यह कार्य नहीं है बल्कि मेरे प्रशंसकों और चाहने वालों द्वारा इंटरनेट और यूट्यूब के जरिए फैलाया गया है। विश्व भर के लाखों युवा नियमित तौर पर मुझे ऑनलाइन तलाश किया करते हैं।
प्रश्न: इतने तल्ख विचार, क्रांतिकारी वक्तव्य और प्रेम, देशप्रेम, सौहार्द में डूबी कविताओं के जरिए आखिर आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहते हैं?
डॉ. कुमार-देखिए मैं जिनसे बात कर रहा हूं उनसे कोई बात नहीं करता। कक्षा नौ में पहुंचते ही उन्हें ट्रिग्नोमेट्री पकड़ा दी जाती है। फिर उन्हें भेज दिया जाता है कोटा जहां पर इंजीनियरिंग की तैयारी के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला लिया जहां प्रोफेसर्स की टेढ़ी नजर हमेशा उनपर बनीं रहती है। वे बच्चे न तो पूरी तरह से अपने मन का कर पाते हैं और न ही अपने शिक्षकों, अभिभावकों की चाहत पर खरा उतर पाते हैं। लेकिन उससे कोई कम्यूनिकेट ही नहीं कर रहा है। देश का वो सबसे सशक्त तबका घुटा जा रहा है। क्या हमारे लिए यह एक बड़ी ही सोच का विषय नहीं है कि एक क्लर्क ने अपनी मेहनत और फंड की जोड़ी गई कमाई से पढ़ाकर अपने बच्चे को इंजीनियर बनाया। बच्चे ने कानपुर आईआईटी से एमटेक किया और चार माह तक उसे प्लेसमेंट नहीं मिला तो उसने आत्महत्या कर ली। इसलिए न तो मेरी रामदेव बनने की इच्छा है और न ही किसी राजनीतिक दल से जुडऩे की इच्छा है (जिनके तमाम प्रस्ताव मेरे पास हैं)। न तो मुझे स्वर शक्ति का दुरुपयोग करने की इच्छा है। मैं तो एक ऐसा कम्यूनिकेटर बनना चाहता हूं जो दो पाइप के बीच वाल्व का काम करे। जिससे युवाओं की ऊर्जा को देश के लिए, उनके घरों के लिए और मानवता के लिए इस्तेमाल कर सकूं। अगर मैं युवाओं के पास जाकर उनसे कहता है कि यह करो यह मत करो तो वे कतई नहीं मानते। इसलिए अपने जीवन की घटनाओं और परिस्थितियों के अलावा आसपास की घटनाओं पर गौर किया और उन्हें सुनाने लगा। संयोगवश मेरी रचनाएं युवाओं ने इतनी पसंद कीं कि उन्हें इंटरनेट, यूट्यूब, आईपॉड के जरिए दुनियाभर में पसंद किया जाने लगा। आज युवा जमकर मुझे सुन रहे हैं और तमाम मेरी बात भी मान रहे हैं।
प्रश्न: नाम बताना चाहेंगे उस कारण का।
डॉ. कुमार-तुम्हारे आंखों की तौहीन है जरा सोचो, तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है।। अब क्या जरूरत रह गई नाम बताने की।
प्रश्न: कुछ पंक्तियां हमारे युवाओं के लिए सुनाएंगे?
डॉ. कुमार-चलिए सबसे पहले आप को वो पंक्ति सुनाता हूं जो आज से पहले किसी भी महफिल में नहीं सुनाई। यूट्यूब या कहीं पर भी यह पंक्तियां नहीं मिलेंगी। बिल्कुल ताजी हैं।
'कोई कब तक महज सोचे कोई कब तक महज गाए,
इलाही क्या ये मुमकिन है कि कुछ ऐसा भी हो जाए।
मेरा मेहताब उसकी रात के आगोश में पिघले,
मैं उसकी नींद में जागूं वो मुझमें घुल के सो जाए।
कोई मंजिल नहीं जचती सफर अच्छा नहीं लगता,
अगर घर लौट भी आऊं तो घर अच्छा नहीं लगता।
करूं कुछ भी मैं अब दुनिया को सब अच्छा ही लगता है,
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता।।Ó
Friday, 12 March 2010
Dr, Kumar Vishwas Latest & Exclusive Video @ Greater Noida
This is really amazing. This is The second performance of Dr. Kumar Vishwas in Delhi NCR in Greater Noida on 12th March 2010. He made the whole crowd Clapping & Cheering with his witty & poetic attitude. Really very Inspiring Event. It''s a marvelous pleasure to hear Dr. kumar Vishwas Live. Seriously,
With Love,
Kumar Hindustani
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Friday, 26 February 2010
what is objective of our life? THINK

...हम किस गली जा रहे हैं.........???
कभी-कभी ऐसा होता है कि आप के मन में एक सवाल कई बार आता है। लेकिन आप चाह कर भी उसे समझ नहीं पाते। शब्द नहीं दे पाते। सवाल का हल नहीं ढूंढ़ पाते। परेशान हो जाते हैं। जब सवाल के बारे में सोचने लगते हैं तो सवाल दिमाग से फुर्र्र हो चुका होता है। ऐसा एक बार नहीं कई बार होता है। जहां तक मेरी बात है तो मैं कभी एक तरफा नहीं सोच पाता। जब तक कोई निर्णय नहीं लेता जब तक सिक्के के दोनों पहलू न समझ लूं।
कभी-कभी यह स्थिति काफी चिंताजनक और परेशानी खड़ी करने वाली होती है। लेकिन करूं भी तो क्या इस चिंता से नहीं उबर पाता और जैसा मेरा रवैय्या है उसके मुताबिक कई बार नहीं तो कम से कम एक बार आप भी ऐसी ही स्थिति से दो चार हुए जरूर होंगे।
दरअसल सवाल बिल्कुल वाजिब, वैयक्तिक, विस्तृत, विश्लेषणात्मक और वैश्विक है। इसलिए इसका हल भी साधारण नहीं हो सकता। हम किस गली जा रहे हैं... शायद कुछ माह पहले ही यह गाना किसी के मोबाइल पर बजता सुना। उसके कुछ दिन बाद मेरी मैडम ने भी यह गाना अपने मोबाइल पर सेव कर लिया और अक्सर सुना करती हैं। तो यह गाना अब तक मेरे कानों में कई बार गूंज चुका है। एक बार गाने के कुछ बोलों पर गौर करते हैं और फिर सोचते हैं अपने सवाल के बारे में।
तो गाना कुछ यूं है-
हम किस गली जा रहे हैं, हम किस गली जा रहे हैं।
अपना कोई ठिकाना नहीं, अपना कोई ठिकाना नहीं।
अरमानों के अंजुमन में, बेसुध है अपनी लगन में।
अपना कोई फसाना नहीं, अपना कोई फसाना नहीं।...
खैर गाना तो लंबा है लेकिन मुझे सिर्फ इसके मुखड़े से मतलब है। गाने के बोलों पर गौर करें तो हम किस रास्ते पर चल रहे हैं, हमारी मंजिल क्या है, हमें कहां जाकर थमना है, किस लक्ष्य को पाना है और क्या हासिल करना है। हमें कुछ भी नहीं पता है। हजारों ख्वाहिशों-अरमानों के इस आभासी बाग-बगीचे में होने के बावजूद हम बेसुध हैं उसी उधेड़बुन में कि हमें यह पाना है, यह बटोरना है, यह हासिल करना है, फलां को नीचा दिखाना है और भी न जाने क्या क्या? लेकिन हमारा कोई फलसफा नहीं है, कुछ भी धरातल पर नहीं है।
पर गौर करने वाली बात है कि इस हकीकत से हम कभी रूबरू ही नहीं हो सके। आज मैंने सोचा कि क्यूं न खुदी से रूबरू होया जाए। क्यूं न यह जानूं कि आखिर मेरी मंजिल क्या है? आखिर मुझे क्या पाना है? आखिर मैं क्यूं इस अंधी दुनिया में भागता जा रहा हूं? क्या हासिल करके खुश होना चाहता हूं? क्यूं दिन-रात एक करके कामयाबी पाने की ललक खत्म होने का नाम नहीं होती? क्यों जब मेरी काबीलियत को दरनिकार कर किसी अयोग्य को आगे बढ़ाया जाता है तो मुझे ईष्र्या सी होने लगती है? आखिर क्यों मैं समस्या आने पर आपा खो बैठता हूं, टूटने लगता हूं, हारा हुआ महसूस करने लगता हूं? आखिर वो क्या चीज है जिसे पाने के बाद मेरी लालसा खत्म हो जाएगी? मेरी जिंदगी के सफर का वो पड़ाव कब आएगा? न जाने कितने सवाल मेरे सामने आंधी में उड़ते धूल के कणों की तरह खड़े होते चले गए। मैं लाख चाहने के बाद भी इन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा हूं। हल नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता हूं कि इसका आखिर उत्तर क्या है।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि आखिर आप भी कौन सी अंधी दौड़ में शामिल हैं, क्या पाना चाहते हैं, जिंदगानी का मकसद क्या है, क्या पाकर संतुष्टि हासिल करेंगे? मुझे पक्का यकीन है कि आपका जवाब भी यही होगा कि यार आज तक इस बारे में सोचा नहीं। कुछ यह भी कह सकते हैं कि क्यों बेफिजूल की बातों में अपना वक्त बर्बाद करूं। या फिर कुछ यह भी सोच सकते हैं कि कोई सिरफिरा है जो बेकार ही सवाल कर रहा है। खुद भी परेशान है और मुझे भी परेशान कर रहा है।
लेकिन मेरे भाई हकीकत से दूर मत भागो। बैठो। सोचो। फिर सोचो। ध्यान लगाओ कि आखिर तुम चाहते क्या हो? क्या हासिल करोगे? हासिल कर लिया तो फिर क्या करोगे? उसके बाद क्या पाने की ललक पैदा हो जाएगी?
सवाल वाकई हैरत में डालने वाला है। सुबह से लेकर रात तक अंधी दौड़ में शामिल हम सब पता नहीं किसे संतुष्ट करना चाहते हैं। खुद को या फिर समाज को या फिर परिवार को। लेकिन सवाल फिर वहीं पीछे छूट जाता है कि यदि हम सभी को संतुष्ट करने के पीछे दौड़ते ही रहे तो सभी पीछे छूट जाएंगे और आगे पहुंचकर संतोष पाने वाले मिल नहीं सकेंगे क्योंकि वो तो बिछड़ चुके हैं।
इसलिए जरूरी है कि आत्मचिंतन किया जाए। सोचा जाए कि हमारी खुदी का मकसद क्या है? विचार किया जाए कि दूसरों को खुशी देने के लिए पहले खुद खुश होना जरूरी है या फिर दुखी होकर खुशी दी जा सकती है। पहचान की जाए कि आखिर वो कौन सा अंधा रास्ता है जिसपर हम तेजी से दौड़े जा रहे हैं लेकिन मंजिल का नामोंनिशां तक नहीं दिखता।
अब बात करते हैं अपने पत्रकारिता समाज की। पढ़ा है कि सच की लौ को बरकरार रखने के लिए ही पत्रकार पैदा होते और मरते हैं। लोगों को हकीकत से रूबरू कराना ही इनके जीवन का लक्ष्य होता है। कैसे भी करके सच को सामने लाना इनके कंधों पर लदी जिम्मेदारी होती है। लेकिन हम में से कितने इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। जिन संस्थानों के लिए हम काम कर रहे हैं उनका मकसद क्या है? हकीकत को सामने लाने में सफल भी रहे तो संस्थान का मकसद आड़े आ जाता है। और अंत में ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है कि इतनी मेहनत की, पंगा लिया, समय बर्बाद किया लेकिन खबर-सच्चाई दब गई। इसके पीछे क्या वजह है?
सीधी सी सच्चाई यह है कि आज बाजार हावी है। खबर और विज्ञापन सब बाजार के जरिए संचालित किए जा रहे हैं। हकीकत से नहीं बल्कि बिजनेस से मीडिया के ठेकेदारों को सरोकार है। तो ऐसे में क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? जवाब है कतई नहीं। बिल्कुल नहीं और कभी नहीं।
क्या किया जाए कि यह बोझ लेकर न जीना पड़े कि चाहते कुछ थे लेकिन मजबूरी में कर कुछ और रहे हैं। बाद में यह सोचकर न पछताना पड़े कि यार ऐसा नहीं करते तो ही ज्यादा अच्छा था। या फिर आईने में अपने अक्स को देखकर नजरें न चुरानी पड़े। इसके लिए हमको अब इस सवाल को फिर से दोहराना पड़ेगा।
हम किस गली जा रहे हैं। इस सवाल का हल खोजना पड़ेगा। जानना पड़ेगा कि आखिर हम क्या चाहते हैं। हम खुद को घुटते हुए देखकर जीने पर यकीन करते हैं या फिर खुली हवा में सांस लेकर बेफिक्री से जीना पसंद है। हमारी मंजिल वो है जिसमें सभी साथ चलकर पहुंचे और खुश हों या फिर जहां हम अकेले पहुंच कर अफसोस जताएं कि
हम खुशी की चाह में जिंदगी से दूर हो गए,
ढूंढऩे चले थे जिंदगी, जिंदगी से दूर हो गए।
कुछ भी करिए लेकिन कुछ यूं करिए कि जीवन का सफर तय करने के बाद कभी अफसोस न हो कि उस वक्त ये न किया होता तो आज यह दुख न उठाना पड़ता। आपका तो पता नहीं लेकिन आज मुझे मेरे सवाल का शायद 80 फीसदी जवाब मिल गया है।
आपका साथी
कुमार हिंदुस्तानी
कभी-कभी ऐसा होता है कि आप के मन में एक सवाल कई बार आता है। लेकिन आप चाह कर भी उसे समझ नहीं पाते। शब्द नहीं दे पाते। सवाल का हल नहीं ढूंढ़ पाते। परेशान हो जाते हैं। जब सवाल के बारे में सोचने लगते हैं तो सवाल दिमाग से फुर्र्र हो चुका होता है। ऐसा एक बार नहीं कई बार होता है। जहां तक मेरी बात है तो मैं कभी एक तरफा नहीं सोच पाता। जब तक कोई निर्णय नहीं लेता जब तक सिक्के के दोनों पहलू न समझ लूं।
कभी-कभी यह स्थिति काफी चिंताजनक और परेशानी खड़ी करने वाली होती है। लेकिन करूं भी तो क्या इस चिंता से नहीं उबर पाता और जैसा मेरा रवैय्या है उसके मुताबिक कई बार नहीं तो कम से कम एक बार आप भी ऐसी ही स्थिति से दो चार हुए जरूर होंगे।
दरअसल सवाल बिल्कुल वाजिब, वैयक्तिक, विस्तृत, विश्लेषणात्मक और वैश्विक है। इसलिए इसका हल भी साधारण नहीं हो सकता। हम किस गली जा रहे हैं... शायद कुछ माह पहले ही यह गाना किसी के मोबाइल पर बजता सुना। उसके कुछ दिन बाद मेरी मैडम ने भी यह गाना अपने मोबाइल पर सेव कर लिया और अक्सर सुना करती हैं। तो यह गाना अब तक मेरे कानों में कई बार गूंज चुका है। एक बार गाने के कुछ बोलों पर गौर करते हैं और फिर सोचते हैं अपने सवाल के बारे में।
तो गाना कुछ यूं है-
हम किस गली जा रहे हैं, हम किस गली जा रहे हैं।
अपना कोई ठिकाना नहीं, अपना कोई ठिकाना नहीं।
अरमानों के अंजुमन में, बेसुध है अपनी लगन में।
अपना कोई फसाना नहीं, अपना कोई फसाना नहीं।...
खैर गाना तो लंबा है लेकिन मुझे सिर्फ इसके मुखड़े से मतलब है। गाने के बोलों पर गौर करें तो हम किस रास्ते पर चल रहे हैं, हमारी मंजिल क्या है, हमें कहां जाकर थमना है, किस लक्ष्य को पाना है और क्या हासिल करना है। हमें कुछ भी नहीं पता है। हजारों ख्वाहिशों-अरमानों के इस आभासी बाग-बगीचे में होने के बावजूद हम बेसुध हैं उसी उधेड़बुन में कि हमें यह पाना है, यह बटोरना है, यह हासिल करना है, फलां को नीचा दिखाना है और भी न जाने क्या क्या? लेकिन हमारा कोई फलसफा नहीं है, कुछ भी धरातल पर नहीं है।
पर गौर करने वाली बात है कि इस हकीकत से हम कभी रूबरू ही नहीं हो सके। आज मैंने सोचा कि क्यूं न खुदी से रूबरू होया जाए। क्यूं न यह जानूं कि आखिर मेरी मंजिल क्या है? आखिर मुझे क्या पाना है? आखिर मैं क्यूं इस अंधी दुनिया में भागता जा रहा हूं? क्या हासिल करके खुश होना चाहता हूं? क्यूं दिन-रात एक करके कामयाबी पाने की ललक खत्म होने का नाम नहीं होती? क्यों जब मेरी काबीलियत को दरनिकार कर किसी अयोग्य को आगे बढ़ाया जाता है तो मुझे ईष्र्या सी होने लगती है? आखिर क्यों मैं समस्या आने पर आपा खो बैठता हूं, टूटने लगता हूं, हारा हुआ महसूस करने लगता हूं? आखिर वो क्या चीज है जिसे पाने के बाद मेरी लालसा खत्म हो जाएगी? मेरी जिंदगी के सफर का वो पड़ाव कब आएगा? न जाने कितने सवाल मेरे सामने आंधी में उड़ते धूल के कणों की तरह खड़े होते चले गए। मैं लाख चाहने के बाद भी इन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा हूं। हल नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता हूं कि इसका आखिर उत्तर क्या है।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि आखिर आप भी कौन सी अंधी दौड़ में शामिल हैं, क्या पाना चाहते हैं, जिंदगानी का मकसद क्या है, क्या पाकर संतुष्टि हासिल करेंगे? मुझे पक्का यकीन है कि आपका जवाब भी यही होगा कि यार आज तक इस बारे में सोचा नहीं। कुछ यह भी कह सकते हैं कि क्यों बेफिजूल की बातों में अपना वक्त बर्बाद करूं। या फिर कुछ यह भी सोच सकते हैं कि कोई सिरफिरा है जो बेकार ही सवाल कर रहा है। खुद भी परेशान है और मुझे भी परेशान कर रहा है।
लेकिन मेरे भाई हकीकत से दूर मत भागो। बैठो। सोचो। फिर सोचो। ध्यान लगाओ कि आखिर तुम चाहते क्या हो? क्या हासिल करोगे? हासिल कर लिया तो फिर क्या करोगे? उसके बाद क्या पाने की ललक पैदा हो जाएगी?
सवाल वाकई हैरत में डालने वाला है। सुबह से लेकर रात तक अंधी दौड़ में शामिल हम सब पता नहीं किसे संतुष्ट करना चाहते हैं। खुद को या फिर समाज को या फिर परिवार को। लेकिन सवाल फिर वहीं पीछे छूट जाता है कि यदि हम सभी को संतुष्ट करने के पीछे दौड़ते ही रहे तो सभी पीछे छूट जाएंगे और आगे पहुंचकर संतोष पाने वाले मिल नहीं सकेंगे क्योंकि वो तो बिछड़ चुके हैं।
इसलिए जरूरी है कि आत्मचिंतन किया जाए। सोचा जाए कि हमारी खुदी का मकसद क्या है? विचार किया जाए कि दूसरों को खुशी देने के लिए पहले खुद खुश होना जरूरी है या फिर दुखी होकर खुशी दी जा सकती है। पहचान की जाए कि आखिर वो कौन सा अंधा रास्ता है जिसपर हम तेजी से दौड़े जा रहे हैं लेकिन मंजिल का नामोंनिशां तक नहीं दिखता।
अब बात करते हैं अपने पत्रकारिता समाज की। पढ़ा है कि सच की लौ को बरकरार रखने के लिए ही पत्रकार पैदा होते और मरते हैं। लोगों को हकीकत से रूबरू कराना ही इनके जीवन का लक्ष्य होता है। कैसे भी करके सच को सामने लाना इनके कंधों पर लदी जिम्मेदारी होती है। लेकिन हम में से कितने इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। जिन संस्थानों के लिए हम काम कर रहे हैं उनका मकसद क्या है? हकीकत को सामने लाने में सफल भी रहे तो संस्थान का मकसद आड़े आ जाता है। और अंत में ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है कि इतनी मेहनत की, पंगा लिया, समय बर्बाद किया लेकिन खबर-सच्चाई दब गई। इसके पीछे क्या वजह है?
सीधी सी सच्चाई यह है कि आज बाजार हावी है। खबर और विज्ञापन सब बाजार के जरिए संचालित किए जा रहे हैं। हकीकत से नहीं बल्कि बिजनेस से मीडिया के ठेकेदारों को सरोकार है। तो ऐसे में क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? जवाब है कतई नहीं। बिल्कुल नहीं और कभी नहीं।
क्या किया जाए कि यह बोझ लेकर न जीना पड़े कि चाहते कुछ थे लेकिन मजबूरी में कर कुछ और रहे हैं। बाद में यह सोचकर न पछताना पड़े कि यार ऐसा नहीं करते तो ही ज्यादा अच्छा था। या फिर आईने में अपने अक्स को देखकर नजरें न चुरानी पड़े। इसके लिए हमको अब इस सवाल को फिर से दोहराना पड़ेगा।
हम किस गली जा रहे हैं। इस सवाल का हल खोजना पड़ेगा। जानना पड़ेगा कि आखिर हम क्या चाहते हैं। हम खुद को घुटते हुए देखकर जीने पर यकीन करते हैं या फिर खुली हवा में सांस लेकर बेफिक्री से जीना पसंद है। हमारी मंजिल वो है जिसमें सभी साथ चलकर पहुंचे और खुश हों या फिर जहां हम अकेले पहुंच कर अफसोस जताएं कि
हम खुशी की चाह में जिंदगी से दूर हो गए,
ढूंढऩे चले थे जिंदगी, जिंदगी से दूर हो गए।
कुछ भी करिए लेकिन कुछ यूं करिए कि जीवन का सफर तय करने के बाद कभी अफसोस न हो कि उस वक्त ये न किया होता तो आज यह दुख न उठाना पड़ता। आपका तो पता नहीं लेकिन आज मुझे मेरे सवाल का शायद 80 फीसदी जवाब मिल गया है।
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