'करूं कुछ भी मैं अब दुनिया को सब अच्छा ही लगता है,
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता।Ó
युवाओं में लोकप्रिय एक इडियट रैंचो हंै डॉ. कुमार विश्वास
*एक निरपेक्ष और निडर कम्यूनिकेटर बनना चाहता हूं*
*मैं तो युवाओं की भावनाओं के संवाद का जरिया मात्र हूं*
भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के भी लाखों युवाओं ने सैकड़ों बार उन्हें सुना, पढ़ा, डाउनलोड और फॉरवर्ड किया है। लाखों युवाओं के लिए वो एक जीता जागता संदेश हैं। अंर्तआत्मा की आवाज सुनकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ी और पीसीएस की नौकरी को लात मार दी। देश के विकास में युवाओं को एकजुट करने वाले, इंजीनियरिंग-मेडिकल-मैनेजमेंट छात्रों के अलावा नौकरीपेशा युवाओं के बीच बहुचर्चित और मोती जैसे शब्दों को अपनी दिलकश आवाज में पिरोकर कभी हंसाने तो कभी रुलाने वाली अंतरराष्ट्रीय शख्सियत का नाम है डॉ. कुमार विश्वास।
जी हां, कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है और पगली लड़की जैसी कविताओं के जरिए युवाओं के दिल में राज करने वाले डॉ. कुमार आज के युवाओं के बीच थ्री इडियट्स के एक इडियट यानी रैंचो बन चुके हैं। पेश है अपनी आवाज और शब्दों के जादू से युवाओं को झकझोर देने वाले डॉ. कुमार से पहली बार हुई किसी खास बातचीत के महत्वपूर्ण अंश।
प्रश्न: आपको क्या कहें वर्चुअल कवि, मोटीवेटर या फिर कुछ और?
डॉ. कुमार-मैं पारंपरिक कवियों की श्रेणी का नहीं बल्कि नई जमात का कम्यूनिकेटर मात्र हूं। उस जमात का जो बेहतर कम्यूनिकेशन के अभाव में एनरिके इग्लेसियस के सम बॉडी को सुन रही थी, फ्रैंड्स देख रही थी। इनको एक ऐसा शख्स चाहिए था जो इनके दिल की बात कहे, इसलिए नियति ने मुझे चुन लिया।
प्रश्न: पढ़ाई और ह्रदय परिवर्तन की क्या कहानी है?
डॉ. कुमार-ये बहुत लोकप्रिय और बदनाम कहानी हो चुकी है। मैं निम्नमध्यम वर्गीय परिवार से हूं जहां पर रोटी के लिए संघर्ष करना जरूरी होता है। मेरे दौर में आज की तरह पढ़ाई के विकल्प नहीं थे। पिता जी ने मानसिक, आर्थिक, आध्यात्मिक और शारीरिक शक्तियां प्रयोग कीं। राष्ट्रीय स्तर पर 99वीं रैंक से एमएलएनआर इलाहाबाद में इंजीनियरिंग के लिए चयनित हुआ। पहले सेमेस्टर के बाद रजनीश की किताब माटी कहे कुम्हार से पढ़ कर लगा कि नियति के विपरीत नहीं जाना चाहिए। मेरा ह्रदय तो हिंदी में रचता-बसता है तो फिर यह उल्टी धारा क्यूं। फिर मैने स्नातक किया। परास्नातक प्रथम वर्ष में यूपीपीसीएस में चयनित हुआ, मुरादाबाद की एक जगह पर साढ़े तीन माह सहायक जिला परियोजना अधिकारी रहा। लेकिन फिर लगा कि क्यों प्रदेश और देश को बर्बाद किया जाए (हंसते हुए)। लेकिन नौकरी करने का जो कारण था वो चला (चली) गया, जबकि नौकरी पा चुका था। परास्नातक में विश्वविद्यालय टॉप किया। लेकिन नियति को यहीं मंजूर था। परास्नातक पूर्ण किया और उसी वर्ष यूजीसी में चयनित हो गया। तबसे कॉलेज में पढ़ा रहा हूं लेकिन गत चार वर्षों से बिना वेतन हूं लेकिन अब नहीं लगता कि नौकरी कर पाऊंगा।
प्रश्न: अखबार-टीवी से अलग इंटरनेट पर इतनी प्रसिद्धि के पीछे आपकी साजिश तो नहीं?
डॉ. कुमार-देखिए मैं मीडिया फ्रैंडली नहीं हूं। हालांकि मीडिया जगत के तमाम बड़े दिग्गज मेरे पुराने मित्रों में से हैं। इसी कारण के चलते मैं देश के एक काफी बड़े टीवी चैनल के बुलावे पर भी नहीं गया। लॉफ्टर शो में नहीं गया और आज भी बिग बॉस थ्री के लिए मुझे ट्रेस किया जा रहा है। लेकिन मैंने मना कर दिया। क्योंकि मैं जानता हूं कि वो मेरे कम्यूनिकेशन स्किल्स और लफ्फाजी से कमाना चाहते हैं। इसलिए एक ऐसा निरपेक्ष कम्यूनिकेटर बनने का मन है जो न किसी से डरता हो और न किसी की चिंता करता हो। कुछ सोचा समझा यह कार्य नहीं है बल्कि मेरे प्रशंसकों और चाहने वालों द्वारा इंटरनेट और यूट्यूब के जरिए फैलाया गया है। विश्व भर के लाखों युवा नियमित तौर पर मुझे ऑनलाइन तलाश किया करते हैं।
प्रश्न: इतने तल्ख विचार, क्रांतिकारी वक्तव्य और प्रेम, देशप्रेम, सौहार्द में डूबी कविताओं के जरिए आखिर आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहते हैं?
डॉ. कुमार-देखिए मैं जिनसे बात कर रहा हूं उनसे कोई बात नहीं करता। कक्षा नौ में पहुंचते ही उन्हें ट्रिग्नोमेट्री पकड़ा दी जाती है। फिर उन्हें भेज दिया जाता है कोटा जहां पर इंजीनियरिंग की तैयारी के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला लिया जहां प्रोफेसर्स की टेढ़ी नजर हमेशा उनपर बनीं रहती है। वे बच्चे न तो पूरी तरह से अपने मन का कर पाते हैं और न ही अपने शिक्षकों, अभिभावकों की चाहत पर खरा उतर पाते हैं। लेकिन उससे कोई कम्यूनिकेट ही नहीं कर रहा है। देश का वो सबसे सशक्त तबका घुटा जा रहा है। क्या हमारे लिए यह एक बड़ी ही सोच का विषय नहीं है कि एक क्लर्क ने अपनी मेहनत और फंड की जोड़ी गई कमाई से पढ़ाकर अपने बच्चे को इंजीनियर बनाया। बच्चे ने कानपुर आईआईटी से एमटेक किया और चार माह तक उसे प्लेसमेंट नहीं मिला तो उसने आत्महत्या कर ली। इसलिए न तो मेरी रामदेव बनने की इच्छा है और न ही किसी राजनीतिक दल से जुडऩे की इच्छा है (जिनके तमाम प्रस्ताव मेरे पास हैं)। न तो मुझे स्वर शक्ति का दुरुपयोग करने की इच्छा है। मैं तो एक ऐसा कम्यूनिकेटर बनना चाहता हूं जो दो पाइप के बीच वाल्व का काम करे। जिससे युवाओं की ऊर्जा को देश के लिए, उनके घरों के लिए और मानवता के लिए इस्तेमाल कर सकूं। अगर मैं युवाओं के पास जाकर उनसे कहता है कि यह करो यह मत करो तो वे कतई नहीं मानते। इसलिए अपने जीवन की घटनाओं और परिस्थितियों के अलावा आसपास की घटनाओं पर गौर किया और उन्हें सुनाने लगा। संयोगवश मेरी रचनाएं युवाओं ने इतनी पसंद कीं कि उन्हें इंटरनेट, यूट्यूब, आईपॉड के जरिए दुनियाभर में पसंद किया जाने लगा। आज युवा जमकर मुझे सुन रहे हैं और तमाम मेरी बात भी मान रहे हैं।
प्रश्न: नाम बताना चाहेंगे उस कारण का।
डॉ. कुमार-तुम्हारे आंखों की तौहीन है जरा सोचो, तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है।। अब क्या जरूरत रह गई नाम बताने की।
प्रश्न: कुछ पंक्तियां हमारे युवाओं के लिए सुनाएंगे?
डॉ. कुमार-चलिए सबसे पहले आप को वो पंक्ति सुनाता हूं जो आज से पहले किसी भी महफिल में नहीं सुनाई। यूट्यूब या कहीं पर भी यह पंक्तियां नहीं मिलेंगी। बिल्कुल ताजी हैं।
'कोई कब तक महज सोचे कोई कब तक महज गाए,
इलाही क्या ये मुमकिन है कि कुछ ऐसा भी हो जाए।
मेरा मेहताब उसकी रात के आगोश में पिघले,
मैं उसकी नींद में जागूं वो मुझमें घुल के सो जाए।
कोई मंजिल नहीं जचती सफर अच्छा नहीं लगता,
अगर घर लौट भी आऊं तो घर अच्छा नहीं लगता।
करूं कुछ भी मैं अब दुनिया को सब अच्छा ही लगता है,
मुझे कुछ भी तुम्हारे बिन मगर अच्छा नहीं लगता।।Ó
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Tuesday, 16 March 2010
Friday, 26 February 2010
what is objective of our life? THINK

...हम किस गली जा रहे हैं.........???
कभी-कभी ऐसा होता है कि आप के मन में एक सवाल कई बार आता है। लेकिन आप चाह कर भी उसे समझ नहीं पाते। शब्द नहीं दे पाते। सवाल का हल नहीं ढूंढ़ पाते। परेशान हो जाते हैं। जब सवाल के बारे में सोचने लगते हैं तो सवाल दिमाग से फुर्र्र हो चुका होता है। ऐसा एक बार नहीं कई बार होता है। जहां तक मेरी बात है तो मैं कभी एक तरफा नहीं सोच पाता। जब तक कोई निर्णय नहीं लेता जब तक सिक्के के दोनों पहलू न समझ लूं।
कभी-कभी यह स्थिति काफी चिंताजनक और परेशानी खड़ी करने वाली होती है। लेकिन करूं भी तो क्या इस चिंता से नहीं उबर पाता और जैसा मेरा रवैय्या है उसके मुताबिक कई बार नहीं तो कम से कम एक बार आप भी ऐसी ही स्थिति से दो चार हुए जरूर होंगे।
दरअसल सवाल बिल्कुल वाजिब, वैयक्तिक, विस्तृत, विश्लेषणात्मक और वैश्विक है। इसलिए इसका हल भी साधारण नहीं हो सकता। हम किस गली जा रहे हैं... शायद कुछ माह पहले ही यह गाना किसी के मोबाइल पर बजता सुना। उसके कुछ दिन बाद मेरी मैडम ने भी यह गाना अपने मोबाइल पर सेव कर लिया और अक्सर सुना करती हैं। तो यह गाना अब तक मेरे कानों में कई बार गूंज चुका है। एक बार गाने के कुछ बोलों पर गौर करते हैं और फिर सोचते हैं अपने सवाल के बारे में।
तो गाना कुछ यूं है-
हम किस गली जा रहे हैं, हम किस गली जा रहे हैं।
अपना कोई ठिकाना नहीं, अपना कोई ठिकाना नहीं।
अरमानों के अंजुमन में, बेसुध है अपनी लगन में।
अपना कोई फसाना नहीं, अपना कोई फसाना नहीं।...
खैर गाना तो लंबा है लेकिन मुझे सिर्फ इसके मुखड़े से मतलब है। गाने के बोलों पर गौर करें तो हम किस रास्ते पर चल रहे हैं, हमारी मंजिल क्या है, हमें कहां जाकर थमना है, किस लक्ष्य को पाना है और क्या हासिल करना है। हमें कुछ भी नहीं पता है। हजारों ख्वाहिशों-अरमानों के इस आभासी बाग-बगीचे में होने के बावजूद हम बेसुध हैं उसी उधेड़बुन में कि हमें यह पाना है, यह बटोरना है, यह हासिल करना है, फलां को नीचा दिखाना है और भी न जाने क्या क्या? लेकिन हमारा कोई फलसफा नहीं है, कुछ भी धरातल पर नहीं है।
पर गौर करने वाली बात है कि इस हकीकत से हम कभी रूबरू ही नहीं हो सके। आज मैंने सोचा कि क्यूं न खुदी से रूबरू होया जाए। क्यूं न यह जानूं कि आखिर मेरी मंजिल क्या है? आखिर मुझे क्या पाना है? आखिर मैं क्यूं इस अंधी दुनिया में भागता जा रहा हूं? क्या हासिल करके खुश होना चाहता हूं? क्यूं दिन-रात एक करके कामयाबी पाने की ललक खत्म होने का नाम नहीं होती? क्यों जब मेरी काबीलियत को दरनिकार कर किसी अयोग्य को आगे बढ़ाया जाता है तो मुझे ईष्र्या सी होने लगती है? आखिर क्यों मैं समस्या आने पर आपा खो बैठता हूं, टूटने लगता हूं, हारा हुआ महसूस करने लगता हूं? आखिर वो क्या चीज है जिसे पाने के बाद मेरी लालसा खत्म हो जाएगी? मेरी जिंदगी के सफर का वो पड़ाव कब आएगा? न जाने कितने सवाल मेरे सामने आंधी में उड़ते धूल के कणों की तरह खड़े होते चले गए। मैं लाख चाहने के बाद भी इन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा हूं। हल नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता हूं कि इसका आखिर उत्तर क्या है।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि आखिर आप भी कौन सी अंधी दौड़ में शामिल हैं, क्या पाना चाहते हैं, जिंदगानी का मकसद क्या है, क्या पाकर संतुष्टि हासिल करेंगे? मुझे पक्का यकीन है कि आपका जवाब भी यही होगा कि यार आज तक इस बारे में सोचा नहीं। कुछ यह भी कह सकते हैं कि क्यों बेफिजूल की बातों में अपना वक्त बर्बाद करूं। या फिर कुछ यह भी सोच सकते हैं कि कोई सिरफिरा है जो बेकार ही सवाल कर रहा है। खुद भी परेशान है और मुझे भी परेशान कर रहा है।
लेकिन मेरे भाई हकीकत से दूर मत भागो। बैठो। सोचो। फिर सोचो। ध्यान लगाओ कि आखिर तुम चाहते क्या हो? क्या हासिल करोगे? हासिल कर लिया तो फिर क्या करोगे? उसके बाद क्या पाने की ललक पैदा हो जाएगी?
सवाल वाकई हैरत में डालने वाला है। सुबह से लेकर रात तक अंधी दौड़ में शामिल हम सब पता नहीं किसे संतुष्ट करना चाहते हैं। खुद को या फिर समाज को या फिर परिवार को। लेकिन सवाल फिर वहीं पीछे छूट जाता है कि यदि हम सभी को संतुष्ट करने के पीछे दौड़ते ही रहे तो सभी पीछे छूट जाएंगे और आगे पहुंचकर संतोष पाने वाले मिल नहीं सकेंगे क्योंकि वो तो बिछड़ चुके हैं।
इसलिए जरूरी है कि आत्मचिंतन किया जाए। सोचा जाए कि हमारी खुदी का मकसद क्या है? विचार किया जाए कि दूसरों को खुशी देने के लिए पहले खुद खुश होना जरूरी है या फिर दुखी होकर खुशी दी जा सकती है। पहचान की जाए कि आखिर वो कौन सा अंधा रास्ता है जिसपर हम तेजी से दौड़े जा रहे हैं लेकिन मंजिल का नामोंनिशां तक नहीं दिखता।
अब बात करते हैं अपने पत्रकारिता समाज की। पढ़ा है कि सच की लौ को बरकरार रखने के लिए ही पत्रकार पैदा होते और मरते हैं। लोगों को हकीकत से रूबरू कराना ही इनके जीवन का लक्ष्य होता है। कैसे भी करके सच को सामने लाना इनके कंधों पर लदी जिम्मेदारी होती है। लेकिन हम में से कितने इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। जिन संस्थानों के लिए हम काम कर रहे हैं उनका मकसद क्या है? हकीकत को सामने लाने में सफल भी रहे तो संस्थान का मकसद आड़े आ जाता है। और अंत में ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है कि इतनी मेहनत की, पंगा लिया, समय बर्बाद किया लेकिन खबर-सच्चाई दब गई। इसके पीछे क्या वजह है?
सीधी सी सच्चाई यह है कि आज बाजार हावी है। खबर और विज्ञापन सब बाजार के जरिए संचालित किए जा रहे हैं। हकीकत से नहीं बल्कि बिजनेस से मीडिया के ठेकेदारों को सरोकार है। तो ऐसे में क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? जवाब है कतई नहीं। बिल्कुल नहीं और कभी नहीं।
क्या किया जाए कि यह बोझ लेकर न जीना पड़े कि चाहते कुछ थे लेकिन मजबूरी में कर कुछ और रहे हैं। बाद में यह सोचकर न पछताना पड़े कि यार ऐसा नहीं करते तो ही ज्यादा अच्छा था। या फिर आईने में अपने अक्स को देखकर नजरें न चुरानी पड़े। इसके लिए हमको अब इस सवाल को फिर से दोहराना पड़ेगा।
हम किस गली जा रहे हैं। इस सवाल का हल खोजना पड़ेगा। जानना पड़ेगा कि आखिर हम क्या चाहते हैं। हम खुद को घुटते हुए देखकर जीने पर यकीन करते हैं या फिर खुली हवा में सांस लेकर बेफिक्री से जीना पसंद है। हमारी मंजिल वो है जिसमें सभी साथ चलकर पहुंचे और खुश हों या फिर जहां हम अकेले पहुंच कर अफसोस जताएं कि
हम खुशी की चाह में जिंदगी से दूर हो गए,
ढूंढऩे चले थे जिंदगी, जिंदगी से दूर हो गए।
कुछ भी करिए लेकिन कुछ यूं करिए कि जीवन का सफर तय करने के बाद कभी अफसोस न हो कि उस वक्त ये न किया होता तो आज यह दुख न उठाना पड़ता। आपका तो पता नहीं लेकिन आज मुझे मेरे सवाल का शायद 80 फीसदी जवाब मिल गया है।
आपका साथी
कुमार हिंदुस्तानी
कभी-कभी ऐसा होता है कि आप के मन में एक सवाल कई बार आता है। लेकिन आप चाह कर भी उसे समझ नहीं पाते। शब्द नहीं दे पाते। सवाल का हल नहीं ढूंढ़ पाते। परेशान हो जाते हैं। जब सवाल के बारे में सोचने लगते हैं तो सवाल दिमाग से फुर्र्र हो चुका होता है। ऐसा एक बार नहीं कई बार होता है। जहां तक मेरी बात है तो मैं कभी एक तरफा नहीं सोच पाता। जब तक कोई निर्णय नहीं लेता जब तक सिक्के के दोनों पहलू न समझ लूं।
कभी-कभी यह स्थिति काफी चिंताजनक और परेशानी खड़ी करने वाली होती है। लेकिन करूं भी तो क्या इस चिंता से नहीं उबर पाता और जैसा मेरा रवैय्या है उसके मुताबिक कई बार नहीं तो कम से कम एक बार आप भी ऐसी ही स्थिति से दो चार हुए जरूर होंगे।
दरअसल सवाल बिल्कुल वाजिब, वैयक्तिक, विस्तृत, विश्लेषणात्मक और वैश्विक है। इसलिए इसका हल भी साधारण नहीं हो सकता। हम किस गली जा रहे हैं... शायद कुछ माह पहले ही यह गाना किसी के मोबाइल पर बजता सुना। उसके कुछ दिन बाद मेरी मैडम ने भी यह गाना अपने मोबाइल पर सेव कर लिया और अक्सर सुना करती हैं। तो यह गाना अब तक मेरे कानों में कई बार गूंज चुका है। एक बार गाने के कुछ बोलों पर गौर करते हैं और फिर सोचते हैं अपने सवाल के बारे में।
तो गाना कुछ यूं है-
हम किस गली जा रहे हैं, हम किस गली जा रहे हैं।
अपना कोई ठिकाना नहीं, अपना कोई ठिकाना नहीं।
अरमानों के अंजुमन में, बेसुध है अपनी लगन में।
अपना कोई फसाना नहीं, अपना कोई फसाना नहीं।...
खैर गाना तो लंबा है लेकिन मुझे सिर्फ इसके मुखड़े से मतलब है। गाने के बोलों पर गौर करें तो हम किस रास्ते पर चल रहे हैं, हमारी मंजिल क्या है, हमें कहां जाकर थमना है, किस लक्ष्य को पाना है और क्या हासिल करना है। हमें कुछ भी नहीं पता है। हजारों ख्वाहिशों-अरमानों के इस आभासी बाग-बगीचे में होने के बावजूद हम बेसुध हैं उसी उधेड़बुन में कि हमें यह पाना है, यह बटोरना है, यह हासिल करना है, फलां को नीचा दिखाना है और भी न जाने क्या क्या? लेकिन हमारा कोई फलसफा नहीं है, कुछ भी धरातल पर नहीं है।
पर गौर करने वाली बात है कि इस हकीकत से हम कभी रूबरू ही नहीं हो सके। आज मैंने सोचा कि क्यूं न खुदी से रूबरू होया जाए। क्यूं न यह जानूं कि आखिर मेरी मंजिल क्या है? आखिर मुझे क्या पाना है? आखिर मैं क्यूं इस अंधी दुनिया में भागता जा रहा हूं? क्या हासिल करके खुश होना चाहता हूं? क्यूं दिन-रात एक करके कामयाबी पाने की ललक खत्म होने का नाम नहीं होती? क्यों जब मेरी काबीलियत को दरनिकार कर किसी अयोग्य को आगे बढ़ाया जाता है तो मुझे ईष्र्या सी होने लगती है? आखिर क्यों मैं समस्या आने पर आपा खो बैठता हूं, टूटने लगता हूं, हारा हुआ महसूस करने लगता हूं? आखिर वो क्या चीज है जिसे पाने के बाद मेरी लालसा खत्म हो जाएगी? मेरी जिंदगी के सफर का वो पड़ाव कब आएगा? न जाने कितने सवाल मेरे सामने आंधी में उड़ते धूल के कणों की तरह खड़े होते चले गए। मैं लाख चाहने के बाद भी इन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा हूं। हल नहीं कर पा रहा हूं। नहीं जानता हूं कि इसका आखिर उत्तर क्या है।
लेकिन क्या आपने सोचा है कि आखिर आप भी कौन सी अंधी दौड़ में शामिल हैं, क्या पाना चाहते हैं, जिंदगानी का मकसद क्या है, क्या पाकर संतुष्टि हासिल करेंगे? मुझे पक्का यकीन है कि आपका जवाब भी यही होगा कि यार आज तक इस बारे में सोचा नहीं। कुछ यह भी कह सकते हैं कि क्यों बेफिजूल की बातों में अपना वक्त बर्बाद करूं। या फिर कुछ यह भी सोच सकते हैं कि कोई सिरफिरा है जो बेकार ही सवाल कर रहा है। खुद भी परेशान है और मुझे भी परेशान कर रहा है।
लेकिन मेरे भाई हकीकत से दूर मत भागो। बैठो। सोचो। फिर सोचो। ध्यान लगाओ कि आखिर तुम चाहते क्या हो? क्या हासिल करोगे? हासिल कर लिया तो फिर क्या करोगे? उसके बाद क्या पाने की ललक पैदा हो जाएगी?
सवाल वाकई हैरत में डालने वाला है। सुबह से लेकर रात तक अंधी दौड़ में शामिल हम सब पता नहीं किसे संतुष्ट करना चाहते हैं। खुद को या फिर समाज को या फिर परिवार को। लेकिन सवाल फिर वहीं पीछे छूट जाता है कि यदि हम सभी को संतुष्ट करने के पीछे दौड़ते ही रहे तो सभी पीछे छूट जाएंगे और आगे पहुंचकर संतोष पाने वाले मिल नहीं सकेंगे क्योंकि वो तो बिछड़ चुके हैं।
इसलिए जरूरी है कि आत्मचिंतन किया जाए। सोचा जाए कि हमारी खुदी का मकसद क्या है? विचार किया जाए कि दूसरों को खुशी देने के लिए पहले खुद खुश होना जरूरी है या फिर दुखी होकर खुशी दी जा सकती है। पहचान की जाए कि आखिर वो कौन सा अंधा रास्ता है जिसपर हम तेजी से दौड़े जा रहे हैं लेकिन मंजिल का नामोंनिशां तक नहीं दिखता।
अब बात करते हैं अपने पत्रकारिता समाज की। पढ़ा है कि सच की लौ को बरकरार रखने के लिए ही पत्रकार पैदा होते और मरते हैं। लोगों को हकीकत से रूबरू कराना ही इनके जीवन का लक्ष्य होता है। कैसे भी करके सच को सामने लाना इनके कंधों पर लदी जिम्मेदारी होती है। लेकिन हम में से कितने इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। जिन संस्थानों के लिए हम काम कर रहे हैं उनका मकसद क्या है? हकीकत को सामने लाने में सफल भी रहे तो संस्थान का मकसद आड़े आ जाता है। और अंत में ढाक के तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है कि इतनी मेहनत की, पंगा लिया, समय बर्बाद किया लेकिन खबर-सच्चाई दब गई। इसके पीछे क्या वजह है?
सीधी सी सच्चाई यह है कि आज बाजार हावी है। खबर और विज्ञापन सब बाजार के जरिए संचालित किए जा रहे हैं। हकीकत से नहीं बल्कि बिजनेस से मीडिया के ठेकेदारों को सरोकार है। तो ऐसे में क्या हम अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं? जवाब है कतई नहीं। बिल्कुल नहीं और कभी नहीं।
क्या किया जाए कि यह बोझ लेकर न जीना पड़े कि चाहते कुछ थे लेकिन मजबूरी में कर कुछ और रहे हैं। बाद में यह सोचकर न पछताना पड़े कि यार ऐसा नहीं करते तो ही ज्यादा अच्छा था। या फिर आईने में अपने अक्स को देखकर नजरें न चुरानी पड़े। इसके लिए हमको अब इस सवाल को फिर से दोहराना पड़ेगा।
हम किस गली जा रहे हैं। इस सवाल का हल खोजना पड़ेगा। जानना पड़ेगा कि आखिर हम क्या चाहते हैं। हम खुद को घुटते हुए देखकर जीने पर यकीन करते हैं या फिर खुली हवा में सांस लेकर बेफिक्री से जीना पसंद है। हमारी मंजिल वो है जिसमें सभी साथ चलकर पहुंचे और खुश हों या फिर जहां हम अकेले पहुंच कर अफसोस जताएं कि
हम खुशी की चाह में जिंदगी से दूर हो गए,
ढूंढऩे चले थे जिंदगी, जिंदगी से दूर हो गए।
कुछ भी करिए लेकिन कुछ यूं करिए कि जीवन का सफर तय करने के बाद कभी अफसोस न हो कि उस वक्त ये न किया होता तो आज यह दुख न उठाना पड़ता। आपका तो पता नहीं लेकिन आज मुझे मेरे सवाल का शायद 80 फीसदी जवाब मिल गया है।
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