Sunday 11 April 2010

NCR's Temerature Rising B'coz

एनसीआर में तेज गर्मी का कारण सिर्फ बढ़ता पारा ही नहीं बहुत कुछ और भी है

दिल्ली की सर्दी...गाना बहुत फेमस हुआ और सर्दियों में पारे के नीचे गिरने से पिछले कई वर्षों के रिकार्ड टूटे। लेकिन सिर्फ सर्दी ने ही सबको रूलाया ऐसा नहीं है, यहां की गर्मी भी लोगों को पसीने से तर बतर कर तड़पा रही है। राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र में सबसे ज्यादा तरक्की की ओर बढ़ता वह क्षेत्र जहां पर हर कोई अपना आशियाना बनाने की चाह रखता है। लेकिन इस क्षेत्र में लगातार उंचाईयां छू रहे पारे के कारण बढऩे वाली गर्मी ने यहां के लोगों को किसी अन्य जगह या फिर किसी पहाड़ी जगह पर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। क्या सिर्फ बढ़ता हुआ तापमान ही इस बेइंतहा गर्मी का मुख्य कारण है या फिर कुछ और वजह भी है।
दरअसल, प्रकृति ने भी अपने आपको एक निराले और बेहतरीन विज्ञान से निर्मित किया है और समय-समय पर अपने आपको संवारती भी रहती है। जैसे किसी को भी अपने कामों में किसी अन्य का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होता, वैसे ही प्रकृति भी किसी भी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करती। यही वजह है कि जितना हम रोज प्रदूषण फैला रहे हैं प्रकृति भी हमको तेज गर्मी, आंधी, तूफान, सूनामी, बिजली, मूसलाधार बारिश, भूकंप सहित न जाने कितनी ही तकलीफें पहुंचा कर अपने संतुलन को बरकरार रखने की कोशिश कर रही है।
आज आधुनिकीकरण की दौड़ में जंगल और पेड़ों को काटकर शहरों का निर्माण हो रहा है जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है। एनसीआर में प्रतिदिन दर्जनों इमारतों का निर्माण होना, लाखों वाहनों और हजारों फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुआं, जहरीली गैसों का अत्याधिक उत्सर्जन सहित न जाने कितने ही तमाम कारण है जो यहां की गर्मी को सिर्र्फ पारे के हिसाब से ही नहीं कई अन्य वजहों से भी बढ़ा रहे हैं।
मौसम विभाग के वैज्ञानिक का कहना है कि काफी हद तक यह सही है कि गर्मी लगने का कारण सिर्फ पारे का चढऩा ही नहीं होता। हमारे आसपास बनी हुईं हजारों फैक्ट्रियां प्रतिदिन वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साईड, सल्फर डाई ऑक्साईड, कार्बन मोनो ऑक्साईड व मीथेन सहित न जाने कितनी ही अन्य हानिकारक और जहरीली गैसें घोलती हैं। इसके साथ ही वाहनों से निकलने वाला धुआं, पुराने हो चुके एअर कंडीशनर व फ्रिज, टायर व पॉलीथीन जैसी गंदगी को जलाना, नॉन रिसाइक्लेबिल प्रोडक्ट्स का प्रयोग, भवन निर्माण में उठने वाली धूल सहित कई ऐसे भी कारण है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारे वातावरण को प्रदूषित करने के साथ ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रहे हैं।
वातावरण में गर्मी बढऩे का एक कारण तो ग्लोबल वार्मिंग है ही लेकिन हमारे द्वारा प्रदूषण फैलाने से हमारा लोकल एटमॉशफीयर गर्म होकर ग्लोबल वार्मिंग को और बढ़ाता है। क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग सिर्फ एक ही जगह से नहीं बढ़ती है बल्कि इसके लिए पूरा विश्व जिम्मेदार है।
हमारे क्षेत्र में प्रदूषण बढऩे से गैसों ने एडमॉशफीयर की सबसे निचली सतह लोअर ट्रोपोस्फीयर के पास तक गैसों की एक लेयर(पर्त) बना दी है। जिससे हमारे आस पास का तापमान बढऩे से हमारे आस पास की हवा गर्म हो जाती है और इन प्रदूषित गैसों की पर्त के कारण ज्यादा उपर नहीं उठ पाती। चूंकि यहां पर पेड़ों की संख्या पर्याप्त न होकर कम है इसलिए यह गर्म हवा चारों ओर चलती रहती है। जिसके फलस्वरूप हमकड्ड भारत के ज्यादातर क्षेत्रों की तुलना में यहां पर गर्मी कुछ ज्यादा ही महसूस होती है।

गर्मी लगने के मुख्य कारण-

-फोटो सेंथेसिज(प्रकाश संश्लेषण क्रिया)- सूरज की रोशनी और वातावरण की कार्बन डाई ऑक्साईड गैस को पेड़ों की पत्तियां शोषित कर लेती हैं और वातावरण में ऑक्सीजन गैस उत्सर्जित करती हैं। पेड़ों की कमी से वातावरण में जहरीली गैसों की बढ़ोत्तरी, ऑक्सीजन की कमी, ठंडी हवा की कमी और भूगर्भ जल स्तर की गिरावट होती है। जिसके फलस्वरूप हम गर्म हवा, लू, ज्यादा तापमान, उमस की शिकायत करते हैं।

-ह्यïूमिडिटी- हवा में वाष्प की मात्रा को कहते हैं। हाई ह्यïूमिडिटी में पसीना निकलने में परेशानी होती है और ज्यादा गर्मी लगती है।

-कंफर्ट इंडेक्स- ह्यïूमिडिटी और तापमान के संयुक्त प्रभाव को कहते हैं। दोनों के बढऩे से कंफर्ट इंडेक्स बढ़ता है और गर्मी ज्यादा परेशान करती है।

Tuesday 6 April 2010

Worlh Health Day: Unsafe Syringes & Increasing Patients

असुरक्षित इंजेक्शन का प्रयोग दे रहा अनचाही बीमारियों को न्यौता

तेजी से बढ़ते जा रही तकनीकी और विज्ञान के नवीन अनुप्रयोगों के बावजूद भी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। प्रतिवर्ष सात अप्रैल को मनाए जाने वाले विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष रूप से यह जानकारी आपको जरूर चौंकाएगी। रिपोर्ट के अनुसार विश्व के विकासशील देशों में प्रयोग किए जाने वाले आधे से ज्यादा इंजेक्शन असुरक्षित होते हैं। जिनसे बीमार को फायदा कम और अनचाही बीमारियां ज्यादा मिलती हैं। बढ़ती कालाबाजारी और अप्रशिक्षित कर्मचारियों के कारण हमारे देश के सरकारी अस्पतालों में भी लगभग सत्तर फीसदी इंजेक्शन असुरक्षित हैं।
वल्र्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन (डब्लूएचओ) की मानें तो विकासशील देशों में कई खतरनाक और अनचाही बीमारियां मुफ्त मेंं मिल रही हैं। हालांकि अनचाही बीमारियां पाने वालों में सबसे ज्यादा संख्या गरीब और किसानों की हैं जो धनाभाव के कारण झोलाछाप और छोटे-मोटे चिकित्सकों से अपना इलाज कराते हैं। गरीबों से पैसे ऐंठने के फेर में यह चिकित्सक इनको हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी, एड्स जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार बना रहे हैं।
हिंदुस्तान सहित कई विकासशील देशों में असुरक्षित सिरिंज का इस्तेमाल मौत को दावत दे रहा है। थोड़े सा पैसे कमाने के फेर में झोलाछाप डाक्टर्स और नीम-हकीम एक सिरिंज को कई बार इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा पिछड़े इलाकों में तमाम कंपनियां भी एक बार प्रयोग हो चुके इंजेक्शन को दोबारा नई पैकिंग में बेच देती हैं। कुशल कंपाउडर्स और अटेंडेंट की कमी भी इंजेक्शन को संक्रमित कर देती है। देश में आज भी काफी अस्पतालों में कांच के इंजेक्शन जो अच्छी तरह से स्ट्रलाइज नहीं होते प्रयोग किए जाते हैं। इन सभी का इस्तेमाल सिर्फ बीमारियों को न्यौता ही दे रहा है।

क्या कहती है शोध रिपोर्ट
सरकारी अस्पतालों को दिए जाने वाले लगभग 35 प्रतिशत इंजेक्शन पूरी तरह से स्ट्रलाइज नहीं होते जबकि लगभग 34 फीसदी खराब रखरखाव और अप्रशिक्षित कर्मियों के द्वारा प्रयोग किए जाने से संक्रमित हो जाते हैं। देश में करीब 75 फीसदी सिरिंज प्लास्टिक के होते हैं जबकि अन्य कांच के। निजी अस्पतालों में भी करीब 59 फीसदी इंजेक्शन संक्रमण फैलाते हैं।

संक्रमित इंजेक्शन से भारत की बीमारियों का ब्यौरा
-53.6 प्रतिशत हेपेटाइटिस बी
-59.5 फीसदी हेपेटाइटिस सी
-24.3 फीसदी एचआईवी एड्स

-5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 71 फीसदी इंजेक्शन दिए जाते हैं जबकि 25 से 59 वर्ष के लोगों को 70 फीसदी।
-48.1 प्रतिशत हर प्रेसक्रिप्शन में इंजेक्शन की सिफारिश की जाती है।

क्यों होता है संक्रमण
-सही ढंग से स्ट्रलाइज न होना
-सुई को दोबारा इस्तेमाल करना
-इंजेक्शन की री-पैकिंग
-बायो-वेस्ट मैनेजमेंट की कमी
-कांच के इंजेक्शनों का इस्तेमाल
-अप्रशिक्षित कर्मियों द्वारा प्रयोग करना
-नियमित ड्रग्स और इंसुलिन लेने वाले
-झोलाछाप डाक्टर्स द्वारा

आटो डिसेबल सिरिंज है निवारण
देश भर में हर साल लाखों लोगों में संक्रमण फैला रहा इंजेक्शन को देखने से सही या खराब का फैसला नहीं किया जा सकता। कई कंपनियों द्वारा बाजार में लाया गया आटो डिसेबल सिरिंज (एडीएस) काफी कारगर साबित हुआ है। एडीएस इंजेक्शन में ऐसी प्रणाली इस्तेमाल होती है जिससे इसके प्रयोग के बाद यह स्वत: ही लाक होकर बेकार हो जाता है और दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता।

सावधानी भी है बचाव
-हमेशा प्रतिष्ठित मेडिकल स्टोर से इंजेक्शन खरीदें
-बिल से जरूर लें
-जांच ले कि इंजेक्शन की पैकिंग सही है
-कांच का इंजेक्शन लगवाने से मना कर दें
-डिस्पोजेबल सिरिंज को इस्तेमाल के बाद नष्ट कर दें
-अस्पतालों में बायो-वेस्ट मैनेजमेंट का सही प्रयोग हो
-झोलाछाप डाक्टर्स और नीम-हकीम से इलाज न कराएं

Thursday 1 April 2010

Beware, someone is making u fool

आज रहिए कूल, ताकि कोई बना न दे अप्रैल फूल

एक तारीख मतलब अप्रैल फूल किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। खासकर उन व्यक्तियों के लिए जो दीन-दुनिया से बेखबर अपने में ही खोए रहते हैं। आज कूल बने रहना आपको कई मुसीबतों से बचा सकता है। किसी दोस्त के एसएमएस, पड़ोसी की गुगली, गर्लफ्रैंड की फोनकाल या फिर किसी सहकर्मी की ई-मेल देखने के बाद हर तरीके से सोच समझ कर ही कोई कार्य करना आपको हंसी का पात्र बनाने से बचा सकता है।
हर साल की तरह आज एक अप्रैल यानी कि अप्रैल फूल डे है। यह वही दिन है जिस दिन दुनिया भर के हर कोने में लाखों-करोड़ों लोग मजाक बन कर रह जाते हैं। समय के साथ हाईटेक होते लोग भी अप्रैल फूल बनाने के लिए एक से बढ़कर एक तरीके एख्तियार कर रहे हैं। अब दोस्तों को पुराने तरीकों से बेवकूफ बनाना आसान नहीं रहा। इसके लिए इंटरनेट काफी मददगार साबित हो रहा है।
अप्रैल फूल बनाने के लिए इंटरनेट पर हजारों वेबसाइट मौजूद हैं। जिनमें एक से एक मजेदार और फुलप्रूफ तरीके बताए गए हैं। कुछ तरीके तो इतने मजेदार हैं जिनको कोई बिना मूर्ख बने समझ ही नहीं सकता है। जैसे काफी मग में व्हाइट पेपर (सफेद मिर्च) लगाकर काफी सर्व करना किसी के पकड़ में नहीं आने वाला।
एक से बढ़कर एक जबर्दस्त एसएमएस और ग्रीटिंग्स की भरमार है। बहाने भी इतने सालिड हैं कि वाकई अब दोस्तों की खैर नहीं।

बाक्स
क्या करें ताकि न बन पाएं अप्रैल फूल
-कोई भी एसएमएस, फोनकाल या ई-मेल का न तो तुरंत रिप्लाई और न हीं कोई निर्णय लें
-अपने दोस्तों से विशेषरूप से सावधानी बरतें
-अचानक बने पार्टी वगैरह के कार्यक्रम में शिरकत करने से बचें
-कहीं भी जाने पर सोच-विचार कर ही कोई कार्य करें
-सिर्फ करीबी ही नहीं अनजान लोग भी आपको बेवकूफ बनाने में खुश होते हैं

बेवकूफ बनाने से पहले सोचें जरूर
-ध्यान रखें कि मजाक केवल एक हद में ही होता है
-अप्रैल फूल बनाने के चक्कर में किसी की भावनाओं, जाति-धर्म, मासूमियत या विश्वास का फायदा न उठाएं
-अनजान को मूर्ख बनाने से पहले प्रतिक्रिया के बारे में सोच लें
-शारीरिक या फिर सामाजिक स्तर पर मखौल उड़ाने से बचें
-सोचें कि यदि आप उस जगह होते तो क्या करते

यदि बन ही जाएं तो क्या करें
-संयमित होकर अपने को समझाएं कि यह केवल एक मजाक है
-गुस्सा या झगड़ा न करें
-गंभीर स्थिति में फंस गए हों तो बड़ी ही सूझबूझ से अपने आप को बाहर निकालें
-किसी पब्लिक प्लेस पर मजाक बनने पर मुस्कराते हुए धन्यवाद देना आपकी महानता व्यक्त करेगा
-केवल एक प्यार भरी हंसी सामने वाले का भी मजाक बना सकती है

पिछले कुछ सालों के प्रसिद्ध किस्से
अप्रैल फूल अब बहुत बड़े स्तर पर बेवकूफ बना रहा है। इसके लिए तमाम लोग मीडिया और हाइटेक संचार यंत्रों का भी सहारा लेने से नहीं चूकते। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के तमाम ऐसे किस्से जिन्होंने हजारों लाखों लोगों को बेवकूफ बनाया।
-ब्रिटनी स्पियर्स और संजय का विवाह
-बिल गेट्स का इस्लाम धर्म कबूलना
-बीएमडब्लू कार, स्पेस सैटेलाइट, जीपीएस सिस्टम आदि से संबंधित कई खबरें
-मंगल ग्रह पर पानी की खबर
-विंडोज कंप्यूटर सिस्टम पर है विंडोज वायरस की ई-मेल